#हरिद्वार_की_खबरें बगलामुखी देवी हिंदू धर्म में दस महाविद्याओं में से 8वीं महाविद्या हैं, जिन्हें 'स्तंभन' (रोकने) की देवी माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में सृष्टि को नष्ट करने वाले भयंकर तूफान को रोकने के लिए भगवान विष्णु की तपस्या से माता पार्वती सौराष्ट्र (गुजरात) की हरिद्रा झील से बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई थीं।
मां बगलामुखी का इतिहास और पौराणिक मान्यताएं:
उत्पत्ति की कथा: पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भयंकर प्रलय आया जिससे सृष्टि नष्ट होने लगी। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव की सलाह पर हरिद्रा सरोवर (हल्दी की झील) के किनारे कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने बगलामुखी रूप में प्रकट होकर तूफान को शांत किया।
मदन राक्षस का संहार: एक अन्य कथा के अनुसार, मदन नामक राक्षस ने वरदान पाकर मनुष्यों और देवताओं को आतंकित कर दिया था। मां बगलामुखी ने मदन का सामना किया और अपनी दिव्य शक्ति से उसकी जीभ खींचकर उसे पंगु बना दिया, जिससे उसका अहंकार चूर-चूर हो गया।
पीताम्बरा रूप: माता बगलामुखी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। वह पीले वस्त्र, पीताम्बर और पीले फूलों से पूजी जाती हैं। इसी कारण उन्हें 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है।
विशेष साधना: मां बगलामुखी को स्तंभन शक्ति की देवी कहा जाता है, जो शत्रुओं की वाणी, विचार और कर्म को पंगु बना सकती हैं। वे अपने भक्तों को कानूनी विवादों, शत्रु बाधा और हर तरह के भय से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
प्रमुख मंदिर: इनका मुख्य और प्राचीन मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा (बनखंडी) में स्थित है, जहां माता स्वयं प्रकट हुई थीं। इसके अलावा, मध्य प्रदेश के नलखेड़ा (शाजापुर) में भी पावन सिद्धपीठ है, जिसे पांडव कालीन माना जाता है।