🇮🇳⃝🇬𝘂𝗽𝘁𝗮 𝗷𝗶 🚩⃝🙏🏻
715 views
🙏राम राम जी : CJC🙏 *एक मिनट* 111111111111 चुनमुन—बारह साल की चंचल लड़की, कक्षा 6 की छात्रा। पढ़ाई में अच्छी, लेकिन एक आदत ऐसी जो उसकी माँ के लिए चिंता का सबब बन गई थी। *वह किसी भी बात को पहली बार में नहीं सुनती थी। ऐसा नहीं था कि उसे सुनाई नहीं देता था, बल्कि वह अपनी ही दुनिया में इतनी मग्न रहती कि माँ की आवाज़ों को अनसुना करना उसकी फितरत बन गई थी।* जब माँ बार-बार टोकतीं, तो वह झुंझलाकर कहती— *"मम्मी! आप इतना क्यों चिल्लाती हैं? मैं आ ही तो रही थी। अभी दो मिनट भी नहीं हुए और आपने चार बार आवाज़ लगा दी। आपको हर काम में इतनी जल्दी क्यों रहती है?"* माँ ठंडी आह भरकर समझातीं— *"बेटा, मैं तुम्हें बेवजह नहीं बुलाती। जब सच में तुम्हारी जरूरत होती है, तभी आवाज़ देती हूँ। क्या मैंने कभी तुम्हें पढ़ते हुए टोका है? बस इसलिए बुलाती हूँ ताकि समय पर काम हो सके।"* पर चुनमुन इन बातों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती। उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसकी यह 'चंद सेकंड्स' की लापरवाही भविष्य में कितनी भारी पड़ सकती है। वह नहीं जानती थी कि ज़िंदगी में कभी-कभी एक पल की देरी भी सदियों का पछतावा दे जाती है। वह दिन, जिसने सब बदल दिया... दोपहर का समय था। चुनमुन बेड पर अपने डेढ़ साल के छोटे भाई आयुष के साथ खिलौनों से खेल रही थी। खेलते-खेलते वह अपने खिलौनों को सजाने में इतनी खो गई कि उसे ध्यान ही नहीं रहा कि नन्हा आयुष रेंगते हुए बेड के किनारे तक पहुँच गया है। माँ किचन में रोटियाँ बेल रही थीं। अचानक उनकी नज़र कमरे की ओर गई। *आयुष बिल्कुल किनारे पर था, एक पल की भी चूक और वह सीधे सिर के बल नीचे गिरता। माँ ने घबराकर चिल्लाते हुए आवाज़ लगाई— "चुनमुन! जल्दी आयुष को पकड़ो, वह गिर जाएगा!"* चुनमुन ने हमेशा की तरह अपनी धुन में जवाब दिया— *"बस एक मिनट मम्मी! मैं खिलौने समेट कर अभी देख रही हूँ।"* एक मिनट... सिर्फ साठ सेकंड, लेकिन दुर्घटना के लिए तो एक सेकंड ही काफी था। *जब तक चुनमुन ने हाथ बढ़ाया, आयुष का संतुलन बिगड़ चुका था। एक ज़ोरदार 'धप' की आवाज़ आई और फिर मासूम आयुष की चीखें पूरे घर में गूँज उठीं।* चुनमुन की रूह कांप गई। आयुष ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था। घर के बाकी सदस्य भी दौड़कर आए। आयुष को चोट आई थी, उसका रोना बंद नहीं हो रहा था। चुनमुन के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। सबकी डाँट और भाई का दर्द देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। जब आयुष शांत हुआ और सब सामान्य हुआ, तो माँ चुनमुन को पास के कमरे में ले गईं। उन्होंने उसे डाँटा नहीं, बल्कि बहुत धीमे और गंभीर स्वर में कहा: *"बेटा, आज तुमने देखा न कि एक मिनट की कीमत क्या होती है? तुमने सोचा कि खिलौने समेटना ज्यादा जरूरी है, जबकि उस पल तुम्हारे भाई की सुरक्षा सबसे बड़ा काम था। कभी सोचा है कि जब कोई पुकारता है, तो उसकी जरूरत कितनी गंभीर हो सकती है?"* माँ ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए आगे कहा— *"दुनिया में बड़ी-बड़ी ट्रेन दुर्घटनाएं, हवाई हादसे या किसी की जान जाने के पीछे अक्सर 'चंद सेकंड्स' की ही देरी होती है। अस्पताल में अगर डॉक्टर एक मिनट देर से पहुँचे, तो किसी का जीवन खत्म हो सकता है। परीक्षा केंद्र या इंटरव्यू में एक मिनट की देरी पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर देती है। समय किसी का इंतज़ार नहीं करता, बेटा।"* माँ की आवाज़ भारी हो गई— *"सोचो, अगर आज आयुष छत पर होता या तुम सड़क पार कर रहे होते, तो इस एक मिनट की लापरवाही का क्या अंजाम होता? जो व्यक्ति तुम्हारे सामने खड़ा है और तुम्हें पुकार रहा है, वही उस समय सबसे महत्वपूर्ण है। उसकी बात को प्राथमिकता देना सीखो।"* चुनमुन की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने माँ का हाथ पकड़कर कहा— "मम्मी, मुझे माफ़ कर दीजिए। आज मुझे समझ आया कि 'अनसुना' करना कितनी बड़ी भूल है। मैं खिलौनों में उलझी रही और भैया गिर गए। मैं आपसे वादा करती हूँ, *आज के बाद मेरी वजह से आपको दूसरी आवाज़ नहीं लगानी पड़ेगी। अब से मेरे लिए काम और समय की अहमियत सबसे ऊपर होगी।"* उस दिन के बाद चुनमुन पूरी तरह बदल गई। अब वह माँ के बुलाने से पहले ही चौकन्नी रहती है। उसकी इस समझदारी ने उसे न केवल घर का चहेता बना दिया, बल्कि उसने समय के उस 'एक मिनट' के मोल को भी आत्मसात कर लिया, जो सफलता और सुरक्षा की पहली सीढ़ी है। दोस्तों, *वक्त की कद्र और अपनों की पुकार को कभी अनसुना न करें, क्योंकि कुछ पलों की देरी जीवन भर का पछतावा बन सकती है।* 👉इ मीडिया से साभार उद्धरित👈 #✍मेरे पसंदीदा लेखक #📓 हिंदी साहित्य #😎मोटिवेशनल गुरु🤘 #📗प्रेरक पुस्तकें📘 #📚कविता-कहानी संग्रह