🌺 अटूट विश्वास: जब द्रौपदी ने उत्तरा को सिखाया जीवन का सबसे बड़ा पाठ! 🌺
हस्तिनापुर के राजमहल का एक शांत कोना। अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा तन्मयता से राजभवन की सेवा में लगी थीं। तभी वहां माता द्रौपदी का आगमन हुआ। उत्तरा के सरल स्वभाव और सेवा भाव को देखकर द्रौपदी का मातृत्व उमड़ पड़ा। उन्होंने अत्यंत स्नेह से उत्तरा के माथे पर हाथ फेरा और एक ऐसी बात कही जिसने उत्तरा को अचंभित कर दिया।
"पुत्री उत्तरा, मेरी एक बात गांठ बांध लो। भविष्य में यदि तुम पर दुखों का पहाड़ भी टूट पड़े, घोर विपत्ति तुम्हें घेर ले, तो अपने किसी नाते-रिश्तेदार या सगे-संबंधी की ओर मत ताकना। उस समय केवल और केवल गोविंद की शरण में जाना।"
उत्तरा का हाथ रुक गया। उनकी आंखों में विस्मय था। उन्होंने कौतूहलवश पूछा, "माता! आप ऐसा क्यों कह रही हैं? क्या अपनों से बढ़कर भी कोई सहारा होता है?"
द्रौपदी की आंखों में अतीत की वो पीड़ा कौंध गई, जिसे उन्होंने स्वयं भोगा था। उन्होंने भारी स्वर में कहा:
"पुत्री, यह सीख मैंने आंसुओं और अपमान की अग्नि में जलकर सीखी है। वह दिन मुझे आज भी याद है जब मेरे पांचों पति—जो विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे—कौरवों के साथ जुए के खेल में अपना सर्वस्व हार गए थे। अंत में उन्होंने मुझे भी दाँव पर लगा दिया और हार गए।
जब दुशासन मुझे बालों से घसीटकर भरी सभा में लाया, तब मैंने कातर दृष्टि से अपने पतियों को पुकारा। पर जिनके बाहुबल पर मुझे गर्व था, वे सिर झुकाए मौन बैठे रहे। मैंने पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और महाराज धृतराष्ट्र से न्याय की भीख मांगी, पर सबकी नीति और मर्यादा उस अधर्म के सामने मौन हो गई। जब संसार के सारे सहारे टूट गए और मैं पूर्णतः असहाय हो गई, तब मैंने अपनी दोनों भुजाएं उठाकर कृष्ण को पुकारा... और उसी पल चमत्कार हुआ।"
हस्तिनापुर की सभा में जब द्रौपदी अपमानित हो रही थीं, उधर मीलों दूर द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत बेचैन थे। उनकी व्याकुलता देख देवी रुक्मिणी ने पूछा, "स्वामी! आप इतने विचलित क्यों हैं?"
श्रीकृष्ण की आंखों में नमी थी। वे बोले, "प्रिये! आज मेरी एक परम भक्त संकट में है। दुष्ट उसे अपमानित कर रहे हैं।"
रुक्मिणी ने तुरंत कहा, "तो आप प्रतीक्षा किस बात की कर रहे हैं? आप जाते क्यों नहीं?"
भगवान ने मर्मस्पर्शी उत्तर दिया:
"प्रिये! मर्यादा पुरुषोत्तम होने के नाते मैं बिना आह्वान के नहीं जा सकता। जब तक द्रौपदी को अपने बल, अपने पतियों के सामर्थ्य और बड़ों के न्याय पर भरोसा है, तब तक मैं द्वार के बाहर खड़ा हूं। पर जिस क्षण वह 'स्वयं' को त्यागकर मुझे पुकारेगी, मैं एक क्षण की भी देरी नहीं करूंगा।"
भगवान ने आगे कहा, "रुक्मिणी, तुम्हें याद है? राजसूय यज्ञ के समय जब मेरी उंगली कट गई थी, तब सब उपचार ढूंढ रहे थे। पर द्रौपदी ने बिना सोचे अपनी कीमती साड़ी का पल्लू फाड़कर मेरी उंगली पर बांध दिया था। आज उसकी साड़ी के उस छोटे से टुकड़े का कर्ज चुकाने का समय आ गया है।"
जैसे ही द्रौपदी ने पुकारा— "हे गोविंद! हे द्वारकाधीश! लाज बचाइए!"
भगवान तुरंत वहां प्रकट हुए और अनंत साड़ियों के ढेर ने द्रौपदी को ढक लिया। दुशासन खींचते-खींचते थक गया, पर वो चीर (साड़ी) कभी समाप्त नहीं हुई।
द्रौपदी ने उत्तरा को समझाया कि संसार के रिश्ते कच्चे धागों जैसे हो सकते हैं, जो संकट में टूट सकते हैं। पर परमात्मा का साथ वह वज्र है जिसे कोई नहीं तोड़ सकता।
"जब सब छोड़ दें, तब समझ लेना कि अब गोविंद ने आपका हाथ थाम लिया है।"
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