नए साल की सुबह थी। शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन चाय की दुकानों से उठती भाप और अख़बार की खड़खड़ाहट बता रही थी कि एक और साल शुरू हो चुका है। रोहित अपनी बालकनी में खड़ा था। मोबाइल पर रात की बधाइयों के संदेश अभी भी चमक रहे थे, पर उसका मन शांत नहीं था।
पिछला साल उसके लिए आसान नहीं रहा था। नौकरी चली गई, कुछ रिश्ते टूट गए और आत्मविश्वास भी कहीं पीछे छूट गया। रात बारह बजे उसने भी दूसरों की तरह “हैप्पी न्यू ईयर” लिखा था, लेकिन दिल से नहीं।
सुबह उसने एक छोटा सा फैसला किया। बड़े वादों की जगह छोटे कदम। वह नीचे उतरकर पास के पार्क में टहलने गया। ठंडी हवा #Educational ने जैसे उसके भीतर जमी उदासी को थोड़ा ढीला कर दिया। एक बूढ़े माली को पौधों में पानी देते देख वह रुक गया। माली मुस्कराया और बोला, “हर साल पौधे नए नहीं होते, पर हर साल उन्हें संभालना नया होता है।”
रोहित को बात समझ आ गई। नया साल जादू नहीं लाता, मौका देता है। उसने घर लौटकर रिज़्यूमे खोला, एक कॉल किया और खुद से कहा—आज से शुरुआत है। नई नहीं, लेकिन सच्ची।