🔴 *सवाल-*
ज़कात किसको कहते है?
*जवाब-*
ज़कात ये अरबी ज़बान का लफ्ज़ है।
जिसके कई माना है
पाक होना, ज्यादती, पाकीज़गी..
ज़कात अपने देने वाले को गुनाहों और बुख्ल (कंजूसी) जैसी घटिया आदत से पाक करती है।
*सिर्फ अल्लाह की ख़ुशनूदी और रज़ामन्दी के लिए एक मुक़र्रर व मुताय्यन माल का किसी मुस्तहिक़ (फ़क़ीर, मिसकीन) मुसलमान को मालिक बना देना है।*
🔴 *सवाल-*
ज़कात किस पर वाजिब है?
*जवाब-*
ज़कात उस शख्स पर वाजिब होती है जो
🔹मुसलमान हो।
🔹अकलमंद, समझदार हो।
(पागल और दीवाने पर ज़कात वाजिब नहीं।)
🔹बालिग हो।
(नाबालिग और छोटे बच्चे के माल पर ज़कात नही।)
🔹निसाब की मिक़दार का मालिक हो।
(साढे सात तोला सोना इस ज़माने के ग्राम के हिसाब से *87 ग्राम 480 मिली ग्राम* और साढे बावन तोला चाँदी= *612 ग्राम 360 मिली ग्राम* होता है।)
🔹माल पर एक साल मुकम्मल हो गया हो।
(माल आने के एक साल पूरा होने पर अगर निसाब के बराबर या निसाब से ज़ाइद माल बाकि रहे तो साल के आखिर में जितना भी माल मौजूद है उस पुरे माल की ज़कात अदा करनी होगी।)
*नोट-*
साल के बिच में माल निसाब से कम हो जाये तो इस से कोई फ़र्क़ नही पड़ेगा।
साल के शुरू और आखिर में निसाब के बराबर या निसाब से ज़ाइद माल होना चाहिए।
हाँ! साल के बीच में माल बिलकुल खतम होकर ज़ीरो बॅलेन्स नही होना चाहिए।
🔹माल ज़रूरतें असलिया और क़र्ज़ से खाली हो।
(ज़रूरते असलिया में रहने का घर, इस्तेमाल के कपड़े, सवारी का जानवर या गाड़ी, राहत व आराम और सजावट का सामान घर के बरतन वगैरा दाखिल है।)
🔹ज़कात वाजिब होने के लिए ज़रूरी है के ज़कात का माल मुकम्मल तौर पर उसकी मिलकियत में हो।
(दूसरे का माल अगर हमारे पास अमानत रखा है तो उसपर ज़कात नही। और अगर हमने दूसरे के पास माल अमानत के तौर पर या बैंक में या फिक्स डिपॉज़िट करके जो माल रखा है उसपर ज़कात वाजिब होगी।)
⛔ज़कात के मसाईल को यहाँ पढ़ कर अपने मक़ामी उलमा से खूब अच्छी तरह समजे।
📚किताबुल फतावा
📚मुहक़्क़क़ व मुदल्लल जदीद मसाईल
📚किताबुल मसाईल
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