"हो राज्य प्राप्त क्या पाएगा?
कर-गत क्या धन लाएगा?
बहु विभव-हेतु ललचाना क्या?
अपनी गरिमा को खोना क्या?
प्रासादों के कनकाभ शिखर,
होते कबूतरों के ही घर,
महलों में गरुड़ न होता है,
कंचन पर कभी न सोता है,
बसता वह कहीं पहाड़ों में,
शैलों की फटी दरारों में।
होकर समृद्ध-सुख के आधीन,
मानव होता नित तप-क्षीण,
सत्ता, किरीट, मणिमय आसन,
करते मनुष्य का तेज हरण,
नर विभव हेतु ललचाता है,
पर वही मनुज को खाता है।"
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