md Rahmat sheikh
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1 days ago
बरेली जेल के गेट पर खड़ा शख़्स #आज़ाद_ख़ान है, नाम आज़ाद, मगर ज़िंदगी के 25 साल सलाख़ों के पीछे गुज़ार चुका, यह रिहाई इंसाफ़ की जीत नहीं, बल्कि पुलिस, अदालत और प्रशासनिक सिस्टम की शर्मनाक नाकामी का सबूत है। साल 2001 में मैनपुरी निवासी आज़ाद ख़ान को एक डकैती के मामले में गिरफ़्तार किया गया। न ठोस सबूत थे, न पुख़्ता गवाह, फिर भी जिला अदालत ने उम्रक़ैद सुना दी। एक ग़रीब मज़दूर, जिसके पास न पैसा था न ताक़त, सिस्टम की भेंट चढ़ गया। दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि पुलिस आरोप साबित नहीं कर सकी और आज़ाद को बरी कर दिया। लेकिन इसके बाद भी वह जेल में बंद रहा क्योंकि जेल प्रशासन को “रिहाई आदेश नहीं मिला” और एक पुराने मामले में 7,000 रुपये का जुर्माना जमा नहीं हो सका। एक बेगुनाह को जुर्माने के नाम पर एक साल और जेल झेलनी पड़ी। मीडिया दबाव के बाद आदेश ईमेल से भेजे गए और सामाजिक संस्था ‘छोटी सी आशा’ ने जुर्माना अदा किया। तब जाकर 25 साल बाद आज़ाद जेल से बाहर आ सका। लेकिन सवाल कायम हैं गलत गिरफ़्तारी का ज़िम्मेदार कौन? बिना सबूत सज़ा देने पर जवाबदेही क्यों नहीं? क्या एक ग़रीब और मुसलमान की क़ीमत आधी ज़िंदगी होती है? #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #💓 मोहब्बत दिल से #💞दिल की धड़कन #❤ गुड मॉर्निंग शायरी👍