'रामचरित मानस' है-- आदिकाव्य 'रामायण' की श्रेष्ठ प्रतिविम्ब :
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रामायण तथा रामचरित मानस के सात सोपान, अर्थात सात कांड ही मनुष्य के लिए आत्मोन्नति की सात सीढीयां-- ये शिक्षा गोस्वामी तुलसी दास जी ने एक- एक 'काण्ड' को लेकर परिभाषित किया है। श्रीमद रामायण है भगवान रामचंद्र जी का 'नाम स्वरूप', जिस में एक- एक काण्ड है श्रीराम जी का एक- एक 'दिव्य अंग' सूचक। जैसे 'बालकांड' है श्रीराम जी के "चरण", ऐसे ही 'अयोध्या कांड' है श्रीराम जी का "कटी" भाग, 'अरण्यकांड' है श्रीराम जी का "उदर", 'किष्किंध्या कांड' है श्रीराम जी का "हृदय", 'सुंदरकांड' है श्रीराम जी का "कंठ", 'लंका कांड' है श्रीराम जी का "श्रीमुख" तथा 'उत्तरकांड' है श्रीराम जी का "मस्तक"।।
रामायण के इन सातों कांड के अन्तःस्वर से अलग- अलग प्रेरणा मिलती है। मुख्यतः 'बाल कांड' के अनुसार, "मन" बालक जैसा होता है। इसीलिए रूपक अर्थ में साकेत स्वरूप कौशल्य नगरी है 'न योध्य'-- "अयोध्या" अर्थात् एक सरल- निष्पाप बालक सम दिव्य चेतना समन्वित 'काया', जो राग- बैर- क्रोध आदि गुणों से सतत उर्द्धस्थ, जिसके अंदर प्रभु श्रीराम जी विराजते हैं।।
सभीओं के लिए परम पूज्य, विश्व के समस्त कविओं के गुरुवर, आदिकबि महर्षी वाल्मीकि कृत "श्रीमद् वाल्मीकि रामायण" को भूतल का सर्व प्रथम महाकाव्य माना जाता है। मूल वाल्मीकि रामायण को संस्कृत विद्वान गोस्वामी तुलसी दास जी ने आज से करीब 432 वर्ष पूर्व, लगभग 80 वर्ष की आयु में "लोककाव्य" के रूप में परिवर्त्तित किया था। सभि वर्गों का लोगों के लिए वह जब मूल संस्कृत रचना को आधार बनाकर लौकिक भाषा में इस महाकाव्य को सुललित पद्य शैली में परिभाषित किया, तब इसी की नयी नामकरण के बारे में बहुत कुछ सोच कर "रामचरित मानस" रखा था।।
ढलती उम्र में परम रामभक्त संत गोस्वामी जी जिस समय इस कार्य में लगे रहे थे, उस समय उनके आसपास के विद्वान चिंतको ने सोचे थे-- तुलसी दास जी रामायण को काव्य रूप में "राम' शब्द से ही आरम्भ करेंगे; पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और "वर्ण" शब्द से ही रघुवंशी- रामकथा को "रामचरित मानस" रूप दे कर, सभी विद्वानों को चमत्कृत किया था। ऐसे करने की मूलभूत जो कारण है, वह यह है की काव्य- गौरव संत जी की विश्वव्यापी सोच ओर भी व्यापक थी, जिसका अंदाजा लगाना सिर्फ कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी है।।
"वर्णानामर्थ संधाना रसानां छन्द सामपि, मन्द्लानां च कर्तारो वन्दे प्राणी विनायको।।" -- श्लोक की भावार्थ में जो अन्तःस्वर है, तदनुसार गोस्वामी जी ने महर्षी वाल्मीकि कृत रामायण को "राम" शब्द से लिखना आरंभ ना करते हुए "वर्ण" शब्द से सुरु किया था। इसी के कारण-- ब्रह्मज्ञानी गोस्वामी जी यथार्थ में साकेत वासी थे और साकेत के असली अधिकारी वही होते हैं, जो दूसरे लोगों का भी सीधा संपर्क परब्रह्म परम पिता ब्रह्मा जी तथा विष्णु भगवान श्रीराम जी से करवाते हैं।।
संत गोस्वामी जी ने उपरोक्त श्लोक के अनुसार रामायण की सुरुआत "व" अक्षर से की है और समाप्ति भी "व" अक्षर पर ही की है। पहला शब्द "व" वर्ण युक्त "राम" और अंतिम शब्द "व" वर्ण युक्त "मानस"-- इन दोनों शब्दों के बीच संपूर्ण 'रामचरित मानस' लिखा गया है। वर्ण शब्द से लिखकर यह जग जाहिर कर दिया है कि पहला "व" वर्ण 'ईश्वर' के लिए और अंतिम "व" वर्ण 'मानव' वर्ग के सभी 'भक्तों' के लिए उद्दिष्ट है। उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्मा "व" वर्ण हे। अतः यह "व" वर्ण संतो के लिए प्रयुज्य हो गयी है। और अंतिम शब्द मानव वर्गों के "मानस" अर्थात स्वाचरित गुण- कर्म से परिचित तथा विभाजित चतुर्वर्ण- आश्रित मानवों के लिए "व" वर्ण में निष्पर्ण हुई है। यंहा "मानवा:" शब्द नही आया हे, जीसी का विवरणात्मक विवेचन हे-- "ते संसार पतड़ घोर किर्र्णे दर्र हान्ति नो मानवा: ।।"
महर्षि वाल्मीकि जी कृत संस्कृत महाकाव्य "रामायण" और ब्रह्मज्ञानी गोस्वामी तुलसी दास जी के द्वारा लोकभाषा में विरचित भव्य "रामचरित मानस" -- ये दोनों से एक 'प्राचीन' और दूसरे 'नवीन' समाज व्यबस्था- सम्मत तथा आपस में सफल योगसूत्र बनाये रखने में जुडुवां जैसे सर्व समर्थ हैं। एक 'सरोवर' की उपमा दे कर 'रामायण' और 'रामचरित मानस' को देखा जाए तो एक सर्वविदित बर्फीली "मानसरोवर" तीर्थ हिमालय में है और दूसरा तीर्थ गोस्वामी तुलसी दास जी ने "मानस सरोवर" नाम से रचना की है। दोनों में फर्क ये है कि, समय तथा संपत्ति के साथ शरीर अच्छा हो तो, दुर्गम बर्फीला पथ अतिक्रम कर, "मानसरोवर" पर पहुंचा जा सकता है; मगर स्थिति जो भी हो, घर में बैठकर ही गोस्वामी जी के इस चलता- फिरता लोकतीर्थ "मानस- सरोवर" के आदर्श रामकथामृत में कोई भी परमार्थी भक्त नहा सकता है।।
इसी के अलावा, हिमालय वाले 'मानसरोवर' में सिर्फ बर्फीली पानी है, जब की तुलसी दास जी के 'मानस- सरोवर' में आदर्श रामकथामृत लालित्य से भरा हुआ है। इसीलिए हिमालय के मानसरोवर तीर्थ में नहाने से तन का मैल दूर होता है, जंहा गोस्वामी जी के इस मानस- सरोवर में स्नान करने से शरीर के मैल के साथ मन के मैल भी साफ हो जाता है। एक कहावत या लोककथा प्रचलित है की, हिमालय के मानसरोवर के किनारे दाने चुगने के लिए 'हंस' आते हैं किंतु उस अद्भुत दृश्य को अबतक कितने लोगों प्रत्यक्ष की, किसी को पता नहीं है। परन्तु गोस्वामी जी के मानस- सरोवर में 'हंस' के स्थान पर स्वयं 'परमहंस' का नित्य निवास है-- ये सभी रामभक्तों के सकारात्मक अनुभव- सापेक्ष एक परम सत्य है। और हिमालय के उस बर्फीली तीर्थ "मानसरोवर" में पांव फिसलने से मानव डूब जाने की खतरा है किंतु इस अमृत रूपिणी रामकथा गर्भित सुललित "मानस- सरोवर" में जो भी भक्त डूबता है, स्वतः उसका बेड़ा पार हो जाता है।।
गोस्वामी जी के द्वारा रचित इस चलते- फिरते तीर्थ "मानस- सरोवर" के चार घाट हैं, जंहा प्रथम घाट पर भगवान शिव जी ने माता पार्वती को तत्व कथा सुनाते हैं, दूसरे घाट पर याज्ञवल्क्य जी ने महर्षी भारद्वाज जी को मन की कथा सुनाते हैं, तीसरे घाट पर काक भुसुंडि जी ने गरुड़ जी को और चौथे घाट पर खोद ब्रह्मज्ञानी रामभक्त तुलसी दास जी ने अपने मन की कथा वचनबद्ध किया है। भगवान शिव जी "वेदांत" के घाट पर, महर्षि याज्ञवल्क्य जी "कर्म" के घाट पर, काक भुशुंडि जी "भक्ति" के घाट पर और स्वयं गोस्वामी जी "शरणागति" के घाट पर बैठे हुए अध्यात्म कथामृत सुनाते हैं। अतः प्रभु श्रीराम जी का आदर्श चरित्र और चरित के जीवंत छबि "मानस- सरोवर" की कुल चार किनारे-- "ज्ञान", "कर्म", "भक्ति" और "शरणागति'' (मोक्ष मार्ग) को दर्शाते हुये निर्विबाद में कालजयी है ।।
जय श्री राम
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