🙏राम राम जी : CJC🙏
*शुद्ध फीस*
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बुज़ुर्ग रामू चुपचाप एक निजी क्लिनिक की दीवार के पास खड़ा था। उसके हाथ में एक पुराना जूट का थैला था, जिसे ऊपर से कसकर बाँधा गया था। अंदर एक काँच की बोतल में शहद, एक कपड़े में लिपटा पनीर, और एक छोटी बोतल में दूध दिख रहा था।
वह सुबह-सुबह ही निकल पड़ा था। शहर तक का सफ़र लंबा था। पहले बस। फिर पैदल चलना।
लेकिन जब वह क्लिनिक के रिसेप्शन पर पहुँचा, तो किसी ने जैसे उसे देखा ही नहीं।
*“क्या आपकी अपॉइंटमेंट है?”* काउंटर पर बैठी एक युवती ने ठंडे स्वर में पूछा।
*“नहीं बेटी… लेकिन कुछ दिनों से सीने में दर्द हो रहा है।”*
लड़की ने बिना उसकी तरफ देखे कंप्यूटर पर कुछ टाइप किया।
*“अपॉइंटमेंट के बिना नहीं हो सकता।”*
“लेकिन… *क्या कोई डॉक्टर मुझे देख नहीं सकता?”*
*“आपके पास रेफ़रल है?”*
“नहीं।”
*“मेडिकल कार्ड?”*
बुज़ुर्ग ने जेब से एक पुराना बटुआ निकाला।
*“मेरे पास पहचान पत्र है…”*
लड़की ने सिर हिलाया।
*“यह काफ़ी नहीं है।”*
उसके पीछे अच्छे कपड़े पहने लोग शांत खड़े थे, अपने फ़ाइलों और अपॉइंटमेंट के साथ।
*रामू ने नज़र झुका ली।*
वह नाराज़ नहीं था।
बस… थका हुआ था।
*वह धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर मुड़ने लगा। उसी समय एक केबिन का दरवाज़ा खुला। सफ़ेद कोट पहने एक डॉक्टर बाहर आए।*
डॉक्टर शर्मा।
उनकी नज़र अचानक उस बुज़ुर्ग पर पड़ी।
और एक पल के लिए… वे ठिठक गए। *रामू किसी से बहुत मिलता-जुलता था, उनके दादाजी से।*
वही पुरानी टोपी। वही मेहनत से खुरदरे हाथ। वही संकोची नज़र।
*“ज़रा रुकिए,” डॉक्टर ने कहा।*
बुज़ुर्ग रुक गया।
“आप… डॉक्टर से मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं?”
रामू ने सिर हिलाया।
“लेकिन मेरी अपॉइंटमेंट नहीं है।”
डॉक्टर उसके पास आए।
*“मेरे साथ आइए।”*
रिसेप्शन से तुरंत आवाज़ आई, *“डॉक्टर साहब… इनकी अपॉइंटमेंट नहीं है।”*
“मुझे पता है।”
*“मैनेजर खुश नहीं होंगे।”*
डॉक्टर हल्के से मुस्कुराए।
*“मैनेजर डॉक्टर नहीं हैं।” और वे रामू को अपने केबिन में ले गए।*
रामू कुर्सी पर संकोच से बैठा था।
*“क्या तकलीफ़ है?*” डॉक्टर ने नरम स्वर में पूछा।
*“सीने में दर्द… और कभी-कभी चक्कर आता है।”*
जाँच बीस मिनट से ज़्यादा चली।
*डॉक्टर ने ध्यान से सुना। उसे जाँचा और शांति से बताया कि क्या करना है।*
जब सब खत्म हुआ, रामू धीरे से उठा।
उसने अपना जूट का थैला उठाया और उसमें से चीज़ें निकालने लगा।
शहद का जार।
पनीर का टुकड़ा।
*“मेरे पास आपको देने के लिए पैसे नहीं हैं, डॉक्टर साहब…”*
उसकी आवाज़ हल्की काँप रही थी।
*“लेकिन मैं यह दे सकता हूँ।”*
उसने शहद उठाया।
*“शुद्ध शहद…”*
*फिर पनीर।*
*“और मेरी गौरी दूध।”*
“वह मेरी गाय है, घर पर।”
डॉक्टर शर्मा कुछ पल चुप रहे।
फिर उन्होंने धीरे से बुज़ुर्ग के हाथ पर अपना हाथ रखा।
*“नहीं, रामू जी इसकी ज़रूरत नहीं है।”*
बुज़ुर्ग ने उनकी तरफ देखा।
*“लेकिन… मैं आपका धन्यवाद करना चाहता हूँ।”*
डॉक्टर मुस्कुराए।
*“मैंने आपकी मदद इसलिए की क्योंकि…”*
वे थोड़ा रुके।
*“जब मैंने आपको देखा, तो मुझे अपने दादाजी याद आ गए और मैंने बचपन में वादा किया था कि अगर मैं डॉक्टर बनूँगा… तो कोई भी दादाजी मेरे पास से बिना सुने वापस नहीं जाएगा।”*
बुज़ुर्ग के हाथ में अभी भी शहद का जार था।
उसकी आँखें भर आईं।
*“तो… कम से कम यह शहद ले लीजिए।”*
डॉक्टर हल्के से हँसे।
*“ठीक है।”*
जब रामू क्लिनिक से बाहर निकला, उसका थैला हल्का हो चुका था।
धूप हल्की-हल्की फैल चुकी थी।
शहर की सड़कें अब भीड़ से भरने लगी थीं।
लेकिन उसके कदम पहले से कुछ हल्के लग रहे थे।
*उसने अपने सीने पर हाथ रखा। दर्द अभी पूरी तरह गया नहीं था… लेकिन मन में एक अजीब-सी शांति थी।*
वह धीरे-धीरे बस स्टैंड की ओर चल पड़ा।
रास्ते में एक छोटी-सी चाय की दुकान दिखी। *दुकानदार ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा— “बाबा, चाय पियोगे?”*
रामू ने थोड़ा सोचा…
फिर सिर हिला दिया।
वह एक कोने में बैठ गया।
गर्म चाय का कप हाथ में लेते ही उसकी आँखें कहीं दूर खो गईं। उसे डॉक्टर शर्मा की बातें याद आ रही थीं—
“कोई भी दादाजी बिना सुने वापस नहीं जाएगा…”
रामू के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
*उसी समय पास की मेज पर बैठे दो आदमी बातचीत कर रहे थे, “आजकल डॉक्टर भी बस पैसे के पीछे भागते हैं…*”
“हाँ, गरीब आदमी की तो कोई सुनता ही नहीं…”*
रामू ने धीरे से उनकी ओर देखा।
कुछ पल चुप रहा।
फिर शांत आवाज़ में बोला—
*“सब एक जैसे नहीं होते, बेटा…”*
दोनों आदमी उसकी तरफ मुड़े।
*“आज एक डॉक्टर ने मुझे बिना पैसे के देखा… और बहुत ध्यान से सुना।”*
उनकी आँखों में हैरानी थी।
“सच?”
रामू ने सिर हिलाया।
*“हाँ… अभी भी अच्छे लोग हैं।”*
चाय खत्म करके वह उठ गया।
बस आई, और वह अपने गाँव की ओर चल पड़ा।
*उधर क्लिनिक में…*
डॉक्टर शर्मा अपने केबिन में बैठे थे।
टेबल पर रखा शहद का जार धूप में चमक रहा था। उन्होंने उसे उठाया…
और कुछ देर तक देखते रहे।
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
“आइए,” उन्होंने कहा।
अंदर वही रिसेप्शन वाली लड़की आई।
*“डॉक्टर साहब… मैनेजर आपको बुला रहे हैं।”*
डॉक्टर हल्के से मुस्कुराए।
“मुझे अंदाज़ा था।”
कुछ देर बाद वे मैनेजर के केबिन में थे।
*“डॉक्टर शर्मा, यह प्राइवेट क्लिनिक है,”* मैनेजर ने सख्त स्वर में कहा।
*“यहाँ नियम होते हैं।”*
*“बिना अपॉइंटमेंट मरीज देखना… यह ठीक नहीं है।”*
डॉक्टर शांत खड़े रहे।
*“अगर कोई आदमी दर्द में हो… तो क्या उसे वापस भेज देना चाहिए?”*
मैनेजर चुप हो गया एक पल के लिए।
*“लेकिन सिस्टम…”*
*“सिस्टम इंसान के लिए है, इंसान सिस्टम के लिए नहीं,”* डॉक्टर ने धीरे से कहा।
कमरे में कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर डॉक्टर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— *“और हाँ… फीस भी ले ली है मैंने।”*
मैनेजर ने भौंहें चढ़ाईं।
*“क्या मतलब?”*
डॉक्टर ने *टेबल पर शहद का जार रख दिया, “सबसे शुद्ध फीस।”*
मैनेजर कुछ नहीं बोला।
शायद पहली बार उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे।
*कुछ हफ्तों बाद… रामू फिर शहर आया।*
इस बार वह पहले से थोड़ा मज़बूत लग रहा था।
*उसके हाथ में वही जूट का थैला था… लेकिन इस बार वह और भी भरा हुआ था।*
वह सीधे क्लिनिक पहुँचा।
रिसेप्शन पर वही लड़की थी।
उसने रामू को देखा…
और इस बार उसका व्यवहार बदल चुका था।
*“नमस्ते बाबा… आपकी अपॉइंटमेंट है?”*
रामू मुस्कुराया।
*“नहीं… लेकिन इस बार मैं डॉक्टर साहब से मिलने आया हूँ… धन्यवाद कहने।”*
लड़की ने बिना कुछ कहे फोन उठाया।
“डॉक्टर शर्मा… कोई आपसे मिलने आया है।”
कुछ ही पलों में डॉक्टर खुद बाहर आ गए। रामू को देखते ही उनके चेहरे पर सच्ची खुशी आ गई।
*“अरे रामू जी! कैसे हैं आप?”*
“अब ठीक हूँ, डॉक्टर साहब,” रामू ने कहा।
*उसने अपना थैला आगे बढ़ाया, “इस बार भी पैसे नहीं… लेकिन थोड़ा गुड़, ताज़ा दूध… और गौरी का फिर से पनीर लाया हूँ।*”
डॉक्टर हँस पड़े।
*“आप नहीं मानेंगे, है ना?”*
रामू ने भी मुस्कुराते हुए कहा। *“नहीं… क्योंकि यह दिल से है।”*
डॉक्टर ने थैला ले लिया।
इस बार बिना मना किए, क्योंकि वह समझ चुके थे—
कुछ चीज़ों की कीमत पैसों से नहीं होती।
*समय धीरे-धीरे बीतता गया। रामू हर महीने शहर आता। कभी दूध लाता, कभी पनीर, कभी गुड़।*
और हर बार… डॉक्टर शर्मा उससे दो मिनट ज़रूर बैठकर बात करते।
*क्लिनिक के स्टाफ ने भी अब उसे पहचानना शुरू कर दिया था।*
रिसेप्शन वाली लड़की अब उसे देखकर मुस्कुरा देती।
“आ गए बाबा?”
और रामू हर बार सिर हिलाकर जवाब देता।
“हाँ बेटी।”
*एक महीने… रामू नहीं आया।*
फिर दूसरा महीना भी बीत गया। डॉक्टर शर्मा को थोड़ा अजीब लगा।
*तीसरे महीने, एक लड़का क्लिनिक में आया। उसके हाथ में वही पुराना जूट का थैला था।*
“डॉक्टर साहब… दादाजी ने भेजा है।”
डॉक्टर का दिल हल्का-सा धड़क उठा।
*“रामू जी कहाँ हैं?”*
लड़के ने धीरे से कहा।
*“अब वो चल नहीं पाते… ज़्यादा बीमार हैं।”*
डॉक्टर बिना एक पल गँवाए उठ खड़े हुए।
“कहाँ रहते हैं?”
*उस शाम… डॉक्टर शर्मा पहली बार रामू के गाँव पहुँचे।*
छोटा-सा घर।
आँगन में बंधी गौरी।
और अंदर चारपाई पर लेटे रामू।
उन्हें देखते ही रामू की आँखों में चमक आ गई।
*“डॉक्टर साहब… आप?”*
डॉक्टर उसके पास बैठ गए।
*“आप नहीं आए… तो मुझे आना पड़ा।”*
रामू हल्का-सा हँसा।
*“इस बार… अपॉइंटमेंट आपने नहीं ली।”*
दोनों हँस पड़े।
लेकिन उस हँसी में एक नमी थी।
*डॉक्टर ने उसे ध्यान से देखा। उसे समझ आ गया… समय कम है*।
उन्होंने उसका हाथ थाम लिया।
*“कुछ चाहिए आपको?”*
रामू ने सिर हिलाया।
*“नहीं… बस एक बात…”*
“कहिए।”
*“आपने उस दिन कहा था… कोई भी दादाजी बिना सुने वापस नहीं जाएगा…”*
डॉक्टर की आँखें भर आईं।
“हाँ…”
*“आज… मैं भी बिना सुने नहीं जाऊँगा ना?”*
डॉक्टर ने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
“कभी नहीं।”
रामू ने धीरे से आँखें बंद कर लीं। चेहरे पर शांति थी।
जैसे कोई अधूरा काम अब पूरा हो गया हो।
*अगली सुबह… गाँव में चुपचाप एक विदाई हुई। डॉक्टर शर्मा भी वहीं खड़े थे।*
पहली बार… एक मरीज को नहीं, बल्कि अपने ही किसी अपने को विदा करते हुए।
*कुछ दिनों बाद… क्लिनिक में एक नया नियम लगा।*
रिसेप्शन के पास एक छोटा-सा बोर्ड टंगा था—
*“अगर किसी को तुरंत मदद की ज़रूरत हो, तो बिना अपॉइंटमेंट भी डॉक्टर से मिल सकते हैं।”*
*नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था— “एक दादाजी की याद में।”*
टेबल पर अब भी वह शहद का जार रखा था।
खाली नहीं हुआ था।
क्योंकि डॉक्टर उसे खत्म नहीं करना चाहते थे।
*वह सिर्फ शहद नहीं था… वह एक याद थी।*
*एक वादा था और इस बात का सबूत भी कि इंसानियत… अभी भी ज़िंदा है।*
दोस्तों , *जब कोई व्यक्ति दर्द में हो, तो उसकी मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है। क्योंकि इंसानियत की कीमत पैसों से नहीं आँकी जा सकती; बल्कि नियमों और पैसों से ऊपर होती है और रिश्तों तथा भावनाओं से जुड़ी होती है।*
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