२६ फ़रवरी
प्रियता और योग्यता भिन्न- भिन्न है,
तुम्हारा प्रिय है इसलिए
वह योग्य भी है, यह ज़रूरी नहीं,
इसलिए दायित्व उसी को सौंपे,
जो योग्य हो,
भले तुम्हारा प्रिय न भी हो!
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी
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