#द्वेष...?
यह कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी
आग जात-धर्म की सब कुछ जला देगी
स्वर्ग नहीं नभ में यहीं कर्म-फल है
परपीड़ा की समझ भवसागर तिरा देगी
जड़ें अंधविश्वास की विनाश ला देगी।
ये कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी।
है मोह-बन्धन से मुक्ति सम्मोहन
करुणामय छाया जीवन का चन्दन
अथाह गहरे शांत सागर को वंदन
अंतश की चेतना प्रफुल्लित स्पंदन
अहंकारित मैं खुद से दूर करा देगी।
यह कट्टरता तुझे अमानुष बना देगी।
पत्थर रज कण में वसुंधरा का अंश
सीख प्रकृति से निर्माण और विध्वंश
पंछी का किसने पूछा उसका वंश
है असहिष्णुता ही धर्म का दंश
अनबन की शूल हृदय को जला देगी।
यह कट्टरता तुम्हें अमानुष बना देगी।
द्वंद्व-भाव से किसका भला हुआ
विष तन - मन में है घुला हुआ ।
है कौन दूध का धुला छाछ से जला हुआ
आएं दिन अच्छे समय बुरा टला हुआ
द्वेष की ज्वाला पथ से भटका देगी।
यह कट्टरता तुम्हें अमानुष बना देगी।
त्यागो घृणा, अपनाओ सह-अस्तित्व,
मानवता जीवन का वास्तविक तत्व।
बाँटे जा प्रेम देख बढ़ता अपनत्व
हर पुरुष में हो पुरुष स्त्री में स्त्रीत्व
करुणा धरती को स्वर्ग बना देगी
यह कट्टरता तुम्हें अमानुष बना देगी।
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