#जय बजरंगबली
॥ श्री हनुमान जी की महिमा: मंगलवार व्रत की अद्भुत कथा ॥
प्राचीन काल की बात है, एक नगर में एक धर्मपरायण ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, समाज में मान-सम्मान भी था, लेकिन उनके घर के आंगन में एक सूनापन था। विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी कोई संतान नहीं थी। यह सूनापन उनके ह्रदय को हर पल कचोटता रहता था।
संतान प्राप्ति की कामना लिए, ब्राह्मण प्रतिदिन नगर से दूर घने वन में जाकर वीर हनुमान जी की कठोर साधना करता और उनसे एक पुत्र की याचना करता।
१. ब्राह्मणी का अटूट संकल्प
दूसरी ओर, घर पर उसकी पत्नी भी उतनी ही धार्मिक और आस्थावान थी। पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक मंगलवार का व्रत पूरी निष्ठा से करती थी। उसका नियम अटल था—वह दिन भर निर्जल उपवास रखती और शाम को हनुमान जी को नैवेद्य (भोग) अर्पित करने के बाद ही भोजन ग्रहण करती थी।
समय बीतता गया। एक बार मंगलवार का दिन आया, लेकिन किसी कारणवश ब्राह्मणी न तो भोजन पका सकी और न ही हनुमान जी को भोग लगा सकी। उसने मन ही मन विचार किया, "आज मैं प्रभु को भोग नहीं लगा पाई हूँ, इसलिए आज मैं भोजन भी ग्रहण नहीं करूँगी। अब अगले मंगलवार को ही हनुमान जी को भोग लगाकर मैं अन्न ग्रहण करूँगी।"
२. परीक्षा और वरदान
यह संकल्प आसान नहीं था। वह पूरे सप्ताह भूखी-प्यासी रही। छह दिन बीत गए और शरीर क्षीण हो गया। अगले मंगलवार तक उसकी दशा अत्यंत नाजुक हो गई और पूजा के समय वह मूर्छित होकर गिर पड़ी।
उसकी इस निष्ठा, त्याग और अटूट प्रेम को देखकर पवनपुत्र हनुमान द्रवित हो उठे। वे तत्काल प्रकट हुए और बोले, "हे देवी! मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे कष्टों का अंत अब निश्चित है।"
हनुमान जी ने उसे एक अत्यंत सुंदर बालक प्रदान करते हुए कहा, "यह बालक तुम्हारी सेवा करेगा और तुम्हारे जीवन को सुखों से भर देगा।" उस बालक को पाकर ब्राह्मणी की खुशी का ठिकाना न रहा। चूँकि वह बालक मंगलवार को प्राप्त हुआ था, इसलिए उसने उसका नाम 'मंगल' रखा।
३. ब्राह्मण का संदेह और क्रोध
कुछ समय पश्चात जब ब्राह्मण वन से अपनी साधना पूरी कर घर लौटा, तो उसने आंगन में एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी बालक को खेलते देखा। आश्चर्यचकित होकर उसने अपनी पत्नी से पूछा, "हे प्रिये! यह बालक कौन है? हमारे घर में इसका आगमन कैसे हुआ?"
पत्नी ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया, "स्वामी! मेरे मंगलवार व्रत और हनुमान जी की कृपा से उन्होंने हमें यह बालक आशीर्वाद स्वरूप दिया है।"
किंतु, ब्राह्मण के मन में संदेह का बीज अंकुरित हो गया। उसे विश्वास नहीं हुआ कि बिना किसी कारण के साक्षात देवता प्रकट होकर पुत्र दे सकते हैं। उसने सोचा कि उसकी पत्नी ने उसके साथ छल किया है। इस अविश्वास ने उसके विवेक को हर लिया।
४. कुएं की घटना और चमत्कार
एक दिन अवसर पाकर ब्राह्मण बालक मंगल को बहाने से घर से दूर ले गया। वहां एक गहरा कुआं था। क्रोध और अविश्वास में अंधे होकर ब्राह्मण ने उस नन्हें बालक को कुएं में धक्का दे दिया और घर लौट आया।
घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा, "स्वामी! मंगल कहाँ है? वह तो आपके साथ ही गया था।"
ब्राह्मण कुछ बोल पाता, उससे पहले ही पीछे से एक मधुर आवाज़ आई। ब्राह्मणी और ब्राह्मण ने मुड़कर देखा तो मंगल मुस्कुराता हुआ खड़ा था। उसके शरीर पर खरोंच का एक निशान तक नहीं था।
यह दृश्य देखकर ब्राह्मण के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह स्तब्ध रह गया कि जिसे उसने कुएं में गिराया था, वह जीवित कैसे है?
५. सत्य का ज्ञान और सुखद अंत
उसी रात, ब्राह्मण के स्वप्न में स्वयं बजरंगबली आए। उन्होंने उसे फटकारते हुए कहा, "हे ब्राह्मण! तूने अपनी पतिव्रता पत्नी पर संदेह करके भारी पाप किया है। वह बालक सत्य में मेरा ही आशीर्वाद है, जो मैंने तुम्हारी पत्नी की भक्ति से प्रसन्न होकर दिया है।"
सत्य जानकर ब्राह्मण को गहरा पश्चाताप हुआ। सुबह होते ही उसने अपनी पत्नी से क्षमा मांगी और बालक मंगल को सीने से लगा लिया।
उस दिन के बाद से, ब्राह्मण और उसकी पत्नी दोनों ने प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत और हनुमान जी की पूजा करना आरंभ कर दिया। उनका जीवन सुख, शांति और समृद्धि से भर गया।
॥ फलश्रुति ॥
> "जो भी मनुष्य सच्चे मन से इस कथा को पढ़ता या सुनता है और नियम व श्रद्धा के साथ मंगलवार का व्रत रखता है, संकटमोचन हनुमान उसके समस्त कष्टों को हर लेते हैं। उसके घर में धन, यश और संतान का सुख सदैव बना रहता है।"
🚩।। बोलो महावीर हनुमान की जय ।।🚩