कबीर, माया काल की खानि है, धेरै त्रिगुण विपरीत । जहां जाय तहा सुख नही. या माया की रीत ।।
कबीर परमेश्वर कहते है माया विपत्ति रुपी काल की वह खान है जो त्रिगुणमयी विकराल रुप धारण करती है यहा जहाँ भी जाती है वहाँ सुख चैन का नाश हो जाता है
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