#गंगा
जब शिव जी ने गंगा जी को अपनी जटा से छोड़ा तो उनकी कितनी धाराएँ प्रकट हुईं और कौन कौन?
उत्तर:---
जब राजा भगीरथ ने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया तो ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर वर माँगने को कहा तब राजा भगीरथ ने अपने साठ हजार पूर्वजों जो भगवान कपिल के श्राप से भस्म हो गये थे, के उद्धार के लिए गंगा जी को पृथ्वी पर भेजने का वर माँगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि हे राजन! गंगा के वेग को रोकने की शक्ति शिव जी के सिवा किसी में नहीं है अतः तुम शिव जी को अपनी तपस्या से प्रसन्न करो। ब्रह्मा जी की आज्ञा को शिरोधार्य कर राजा भगीरथ ने शिव जी की घोर तपस्या की तब शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और गंगा जी के वेग को अपनी जटाओं में रोकने का आश्वासन दिया। तत्पश्चात् ब्रह्मा जी ने गंगा को छोड़ा और शिव जी ने अपने मस्तक पर गंगा जी के वेग को रोका पर गंगा जी उनकी जटाओं में हीं उलझ कर रह गईं तब राजा भगीरथ ने फिर से अपनी तपस्या द्वारा शिव जी को प्रसन्न किया और तब शिव जी ने गंगा को अपनी जटाओं से विन्दुसरोवर में छोड़ा। वहाँ से गंगा जी की सात धाराएँ निकलीं। ह्लादिनी, पावनी और नलिनी ये तीन धाराएँ पूर्व दिशा की ओर चलीं गईं। सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु ये तीन धाराएँ पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हुईं। अंतिम सातवीं धारा महाराज भगीरथ के रथ के पीछे पीछे चलीं जो भागीरथी और गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुईं। यही गंगा राजा भगीरथ के पीछे पीछे चलते हुए पूर्व दिशा में भगवान कपिल के आश्रम में पहुँचीं जहाँ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया और फिर समुद्र में समा गईं। महाराज भगीरथ ने गंगा जी को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को तो तारा हीं सारे जगत का भी कल्याण कर दिया।
गंगा को त्रिपथगा भी कहा जाता है। यह तीन लोकों में प्रवाहित होतीं हैं। देवलोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक। इसीलिए इन्हें त्रिपथगा कहा जाता है।