#सेहरी मुबारक #सेहरी #इफ्तार और सहरी #इफ्तार #🍛इफ्तार मुबारक😊
*हर उस माँ का, हर उस बहिन का, हर औरत का और हर उस बहु-बेटी का दिल की गहराइयों से शुक्रिया जो
#सेहरी व
#इफ्तारी के औकात में पूरे घर वालो की खिदमत करती हैं। अल्लाह ताला इन तमाम औरतों को बरकतों और खुशियों से नवाज़े और अल्लाह इनकी मेहनतों का इनको अच्छा बदला अता फरमाए तमाम दुआएं कबूल फरमाए। आमीन!* Liyaqatkhanwarsi
*रमज़ान के महीने में मुस्लिम औरत बेचारी सबसे बाद में सो कर भी सबसे पहले उठती है।खुद सहरी बनाती है लेकिन सबसे आखिर में खाती है।दिन भर रोज़ा रख कर दूध पीतों को दूध पिलाती और बिना रोज़े वाले दूसरे बेरोजेदार बच्चों के लिए दोपहर में भी खाना पका कर खिलाती है।इसके बाद पता नहीं कैसे वो दोपहर की नमाज़ पढ़ पाती है और बिना पूरा आराम करे चार बज़े से ही इफ्तारी बनाने में जुट जाती है।* lkw
*उसे रोज़ हर एक की पसंद के पकौड़े, चिकन, चने और ना जाने क्या क्या बनाना पड़ता है फिर भी यही टेंशन रहती है कि पता नहीं शौहर ,बाप, ससुर या बच्चों को पसंद आएंगे या नहीं।इसी पसंद न पसंद पर वो किसी न किसी का ग़ुस्सा अफ्तार करने से पहले बर्दाश्त करती है।भले ही बाक़ी सब दस्तरखान पर बैठ जाते हैं लेकिन वो तो अज़ान के शुरू होने तक कुछ न कुछ इसलिए तलती रहती है कि उसके घर वालों को बासी चीज़ें पसंद नहीं आती हैं।* Liyaqatkhanwarsi
*ग़ौर करो वो तो सब घर वालों के रोज़ा खोलने की फ़िक्र करती है लेकिन उसकी फ़िक्र कोई नहीं करता वो खुद ही चुपके से सबसे बाद में रोज़ा खोल पाती है।वो तमाम घर वालों को अफ्तारी खिला कर या शर्बत पिला कर सबकी ख़ातिरदारी करती है लेकिन फिर भी कोई इफ्तारी ऐसी नहीं होती जिसमें उसे तारीफ सुनने मिल जाए उसे तो उल्टे तारीफ़ के बजाय पकौड़े, शर्बत या खाने में रोज़ शिकायतें सुनना पड़ती हैं।* lkw
*जब सब लोग शौहर, भाई, अब्बा, बच्चे इफ्तार और खाने से निबट जाते हैं तब वो दस्तरखान समेट कर बर्तनों को धोकर इतने फारिग़ भी नहीं होती कि तरावीह के बाद भी कोई न कोई फर्द दोबारा खाना मांग लेता है लेकिन वो उसे भी बिना कुछ कहे फिर से खिला देती है।इन तमाम कामों को ख़त्म करने और सबके सुलाने के इन्तज़ाम में उसे आधी रात हो जाती है जिस वजह से वो पता नहीं कब और किस हिम्मत से नमाज़, तरावीह या कुरान बगैरह पढ़ती है कोई दूसरा नहीं जानता है। उसे 2-30 बजे सहरी पकाने के लिए उठना होता है इसलिए किसी का मोबाइल मांग कर अलार्म लगाना भी याद रखना पड़ता है वर्ना अगर आंख नहीं खुली और घर वालों का बगैर सहरी का रोज़ा हो गया तो, सारा दिन उसे घर वालों का गुस्सा जो बर्दाश्त करना होता है।*
*मेरे इस्लामी भाईयो असली मुसलमान बनो अबकी बार घर की ख़वातीन से तुम्हारा जो भी रिश्ता हो चाहे मां, बहन, बीबी या बेटी उनका भी रमज़ान में पूरा खयाल रखने की कोशिश करो।वो भी तो आप ही की तरह इंसान हैं, उनको भी आप ही की तरह थकान होती है, उन्हें भी नींद, आराम और दिल आज़ारी की ज़रूरत है।इसलिए आप अपने घर की औरतों को भी इस बाबरकत महीने में इबादत करने और सवाब कमाने का ज़्यादा से ज़्यादा मौका दें ताकि वो भी रमज़ान के फैज़ान से अपने आपको मालामाल कर सकें। औरतें ही हमारे समाज या घरों की रोनक और बहारें हैं उनकी इज़्ज़त करना, उनका हक़ देना बहुत ज़रूरी है।जो उनके साथ भलाई की कोशिश करेगा अल्लाह उसका बेहतर बदला और जज़ा उसे देगा।औरत क़ुर्बानी का ही दूसरा नाम है जो बेटी की शक्ल में पैदा होती है, बहन की शक्ल में बड़ी होती है, बीवी की शक्ल में शौहर का घर आबाद करती है और मां की शक्ल में दुनिया की सबसे अज़ीम हस्ती बन जाती है।उससे जो भी मुहब्बत करेगा तो वो भी बदले में उसे बेग़रज़ मुहब्बत देते हुए अपनी जान तक निछावर करने तैयार रहेगी।*
Best wishes Allah bless you 💕
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