जितना तुम हुस्न-ए-ज़फ़र के नग़्मे सजाते रहे,
हम रूह-ए-इश्क़ में अपने ख़ुद को जलाते रहे।
तुम दास्ताँ-ए-मरातिब में अपना नाम लिखते गए,
हम नक़्श-ए-फ़साना बनकर ख़ामोशियाँ गुनगुनाते रहे।
तुम नूर-ए-फ़तह के झिलमिल जल्वों में खोते रहे,
हम साया-ए-दर्द में हर सांस को तराशते रहे।
तुम सहर-ए-कामयाबी में सुबहें उगाते रहे,
हम रात-ए-वस्ल की ख़ामोशी में उम्रें गँवाते रहे।
तुम हुस्न-ए-मकाँ की महफ़िल में आईने बदलते रहे,
हम राह-ए-जानाँ में ज़ख़्मों को कव्वालियाँ सुनाते रहे।
तुम ताज-ए-नफ़्स के रक़्स में बस ख़ुद को सजाते रहे,
हम हसरत-ए-लफ़्ज़ में हर ख़्वाब जलाते रहे।
‘दस्ता’ तेरी दुनिया ने हमें रंज़-ओ-वफ़ा ही दिया,
फिर भी हम तेरी याद में ख़ुद को ख़ज़ाना बताते रहे।
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