#जय श्री कृष्ण
⁉️धन्य_कौन⁉️
🕉️एक बार भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के दुर्योधन के यज्ञ से निवृत्त होकर द्वारका लौटे थे। यदुकुल की लक्ष्मी उस समय ऐन्द्री लक्ष्मी को भी मात कर रही थी। सागर के मध्य स्थित श्रीद्वारका पुरी की छटा अमरावती की शोभा को भी तिरस्कृत कर रही थी। इन्द्र इससे मन-ही-मन लज्जित तथा अपनी राज्यलक्ष्मी से द्वेष-सा करने लग गये थे। हृषीकेश नन्दनन्दन की अद्भुत राज्यश्री की बात सुनकर उसे देखने को उसी समय बहुत-से राजा द्वारका पधारे। इनमें कौरव-पाण्डवों के साथ पाण्ड्य, चोल, कलिङ्ग, बाह्लीक, द्रविड़, खश आदि अनेक देशोंके राजा-महाराजा भी सम्मिलित थे।
‼️एक बार इन सभी राजा- महाराजाओं के साथ भगवान् श्रीकृष्ण सुधर्मा सभा में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे।
अन्य राजा-महाराजा गण भी चित्र-विचित्र आसनों पर यथा स्थान चारों ओर से उन्हें घेरे बैठे थे। उस समय वहाँ की शोभा बडी विलक्षण थी। ऐसा लगता था मानो देवताओं तथा असुरों के बीच साक्षात् प्रजापति ब्रह्माजी विराज रहे हों।‼️
🪴 इसी समय मेघनाद के समान तीव्र वायु का नाद हुआ और बड़े जोरों की हवा चली। ऐसा लगता था कि अब भारी वर्षा होगी और दुर्दिन-सा दीखने लग गया। पर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ जब कि इस तुमुल दुर्दिन का भेदन करके उसमें से साक्षात् देवर्षि नारद निकल पड़े। वे ठीक अग्निशिखा के सदृश नरेन्द्रों के बीच सीधे उतर पड़े। नारदजी के पृथ्वी पर उतरते ही वह दुर्दिन ( वायु-मेघादि का आडम्बर ) समाप्त हो गया। समुद्र-सदृश नृपमण्डली के बीच उतर-कर देवर्षि ने सिंहासनासीन श्रीकृष्ण की ओर मुख करके कहा— 'पुरुषोत्तम ! देवताओं के बीच आप ही परम आश्चर्य तथा धन्य हैं।' इसे सुनकर प्रभु ने कहा— 'हाँ, मैं दक्षिणाओं के साथ आश्चर्य और धन्य हूँ।' इस पर देवर्षि ने कहा— 'प्रभो ! मेरी बात का उत्तर मिल गया, अब मैं जाता हूँ।' श्रीनारद को चलते देख राजाओं को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे कुछ भी समझ न सके कि बात क्या है। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा— 'प्रभो ! हमलोग इस दिव्य तत्त्व को कुछ जान न पाये; यदि गोप्य न हो तो इसका रहस्य हमें समझाने की कृपा करें।' इस पर भगवान् ने कहा— 'आपलोग धैर्य रखें, इसे स्वयं नारदजी ही सुना रहे हैं।' यों कहकर उन्होंने देवर्षि को इसे राजाओं के सामने स्पष्ट करने के लिये कहा।🪴
🤹नारदजी कहने लगे— "राजाओ ! सुनो — जिस प्रकार मैं इन श्रीकृष्ण के माहात्म्य को जान सका हूँ, वह तुम्हें बतलाता हूँ। एक बार मैं सूर्योदय के समय एकान्त में गङ्गा-किनारे घूम रहा था। इतने में ही वहाँ एक पर्वताकार कछुआ आया। मैं उसे देखकर चकित रह गया। मैंने उसे हाथ से स्पर्श करते हुए कहा— 'कूर्म ! तुम्हारा शरीर परम आश्चर्यमय है। वस्तुतः तुम धन्य हो। क्योंकि तुम निःशङ्क और निश्चिन्त होकर इस गङ्गा में सर्वत्र विचरते हो, फिर तुमसे अधिक धन्य कौन होगा ?' मेरी बात पूरी भी न हो पायी थी कि बिना ही कुछ सोचे वह कछुआ बोल उठा— 'मुने ! भला मुझमें आश्चर्य क्या है तथा प्रभो ! मैं धन्य भी कैसे हो सकता हूँ ? धन्य तो हैं ये देवनदी गङ्गा, जो मुझ जैसे हजारों कछुए तथा मकर, नक्र, झषादि संकुल जीवों की आश्रयभूता शरण दायिनी हैं। मेरे-जैसे असंख्य जीव इनमें भरे हैं—विचरते रहते हैं, भला इनसे अधिक आश्चर्य तथा धन्य और कौन है ?'🤹
🌍"नारदजी ने कहा, 'राजाओ ! कछुए की बात सुन कर मुझे बड़ा कुतूहल हुआ और मैं गङ्गादेवी के सामने जाकर बोला— 'सरित् श्रेष्ठे गङ्गे ! तुम धन्य हो। क्योंकि तुम तपस्वियों के आश्रमों की रक्षा करती हो, समुद्र में मिलती हो, विशालकाय श्वापदों से सुशोभित हो और सभी आश्चर्यों से विभूषित हो।' इस पर गङ्गा तुरंत बोल उठीं— 'नहीं, नहीं, देवगन्धर्व प्रिय देवर्षे ! कलहप्रिय नारद ! मैं क्या आश्चर्यविभूषित या धन्य हूँ। इस लोक में सर्वाश्चर्यकर परमधन्य तो समुद्र ही है, जिसमें मुझ-जैसी सैकड़ों बड़ी-बड़ी नदियाँ मिलती हैं।' इस पर मैंने जब समुद्र के पास जाकर उसकी ऐसी प्रशंसा की तो वह जलतल को फाड़ता हुआ ऊपर उठा और बोला— 'मुने ! मैं कोई धन्य नहीं हूँ; धन्य तो है यह वसुन्धरा, जिसने मुझ जैसे कई समुद्रों को धारण कर रखा है और वस्तुतः सभी आश्चर्यों की निवास भूमि भी यह भूमि ही है।'🌍
💦 "समुद्र के वचनों को सुनकर मैंने पृथ्वी से कहा, 'देहधारियों की योनि पृथ्वी ! तुम धन्य हो। शोभने ! तुम समस्त आश्चर्यो की निवास भूमि भी हो।' इसपर वसुन्धरा चमक उठी और बड़ी तेजी से बोल गयी— 'अरे ! ओ संग्रामकलहप्रिय नारद ! मैं धन्य-वन्य कुछ नहीं हूँ, धन्य तो हैं ये पर्वत जो मुझे भी धारण करने के कारण 'भूधर' कहे जाते हैं और सभी प्रकार के आश्चर्यों के निवास स्थल भी ये ही हैं।' मैं पृथ्वी के वचनों से पर्वतों के पास उपस्थित हुआ और कहा कि 'वास्तव में आपलोग बड़े आश्चर्यमय दीख पड़ते हैं। सभी श्रेष्ठ रत्न तथा सुवर्ण आदि धातुओं के शाश्वत आकर भी आप ही हैं, अतएव आपलोग धन्य हैं।' पर पर्वतों ने भी कहा— 'ब्रह्मर्षे ! हमलोग धन्य नहीं हैं। धन्य हैं प्रजापति ब्रह्मा और वे सर्वाश्चर्यमय जगत् के निर्माता होने के कारण आश्चर्यभूत भी हैं।'💦
🌷 “अब मैं ब्रह्माजी के पास पहुँचा और उनकी स्तुति करने लगा— 'भगवन् ! एकमात्र आप ही धन्य हैं, आप ही आश्चर्यमय हैं। सभी देव, दानव आपकी ही उपासना करते हैं। आपसे ही सृष्टि उत्पन्न होती है, अतएव आपके तुल्य अन्य कौन हो सकता है ?' इसपर ब्रह्माजी बोले— 'नारद ! इन धन्य, आश्चर्य आदि शब्दों से तुम मेरी क्यों स्तुति कर रहे हो ? धन्य और आश्चर्य तो ये वेद हैं, जिनसे यज्ञों का अनुष्ठान तथा विश्व का संरक्षण होता है।' अब मैं वेदों के पास जाकर उनकी प्रशंसा करने लगा तो उन्होंने यज्ञों को धन्य कहा। तब मैं यज्ञों की स्तुति करने लगा। इसपर यज्ञों ने मुझे बतलाया कि— 'हम धन्य नहीं, विष्णु धन्य हैं, वे ही हमलोगों की अन्तिम गति हैं। सभी यज्ञों के द्वारा वे ही आराध्य हैं।'🌷
🕉️ "तदनन्तर मैं विष्णु की गति की खोज में यहाँ आया और आप राजाओं के मध्य श्रीकृष्ण के रूप में इन्हें देखा। जब मैंने इन्हें धन्य कहा, तब इन्होंने अपने को दक्षिणाओं के साथ धन्य बतलाया। दक्षिणाओं के साथ भगवान् विष्णु ही समस्त यज्ञों की गति हैं। यहीं मेरा प्रश्न समाहित हुआ और इतने से ही मेरा कुतूहल भी निवृत्त हो गया। अतएव मैं अब जा रहा हूँ।" यों कह कर देवर्षि नारद चले गये। इस रहस्य तथा संवाद को सुन कर राजा लोग भी बड़े विस्मित हुए और सबने एकमात्र प्रभु को ही धन्यवाद, आश्चर्य एवं सर्वोत्तम प्रशंसा का पात्र माना।🕉️
➖ हरिवंश, विष्णुपर्व, अध्याय ११०, धन्योपाख्यान से
🙏ॐ_नमो_नारायणाय 🙏
🙏ॐ_नमो_भगवते_वासुदेवाय
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यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि
नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति ।
ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा
संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये 💞🙏💞
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