Davinder Singh Rana
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1 days ago
*श्रीमद्भागवतमहापुराणम्* *प्रथमः स्कन्धः* *अथ प्रथमोऽध्यायः (अध्याय एक)* 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 श्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियों का प्रश्न जिससे इस जगत्‌की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं — क्योंकि वह सभी सद्रूप पदार्थों में अनुगत है और असत् पदार्थों से पृथक् है; जड नहीं, चेतन है; परतन्त्र नहीं, स्वयं प्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं, प्रत्युत उन्हें अपने संकल्पसे ही जिसने उस वेद-ज्ञान का दान किया है; जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियोंमें जलका, जलमें स्थलका और स्थलमें जलका भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान-सत्तासे सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योतिसे सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्यसे पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्माका हम ध्यान करते हैं ⁠।⁠। ⁠1 ⁠।⁠। महामुनि व्यासदेव के द्वारा निर्मित इस श्रीमद्भागवतमहापुराण में मोक्षपर्यन्त फलकी कामना से रहित परम धर्मका निरूपण हुआ है⁠। इसमें शुद्धान्तःकरण सत्पुरुषों के जानने योग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्मा का निरूपण हुआ है, जो तीनों तापोंका जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देनेवाली है⁠। अब और किसी साधन या शास्त्र से क्या प्रयोजन⁠। जिस समय भी सुकृती पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते हैं, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदयमें आकर बन्दी बन जाता है ⁠।⁠।⁠ 2 ।⁠। शेष्ट अगली पोस्ट में .. भागवत महापुराण गीता प्रेस राणा जी खेड़ांवाली🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🕉️सनातन धर्म🚩