sn vyas
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#जय हनुमान हनुमान जी का स्वयं को "दास" कहना उनके अनन्य समर्पण, अहंकार के पूर्ण त्याग और प्रभु श्री राम के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को दर्शाता है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है: १. अहंकार का पूर्ण विसर्जन हनुमान जी अतुलनीय बल, बुद्धि और विद्या के स्वामी हैं, परंतु जब वे कहते हैं कि "मैं तो दास हूँ," तो वे अपने समस्त सामर्थ्य का श्रेय श्री राम को दे देते हैं। यह दर्शाता है कि भक्ति में 'मैं' (अहंकार) के लिए कोई स्थान नहीं है। २. दास भाव (दास्य भक्ति) भक्ति मार्ग में 'दास्य भाव' को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। हनुमान जी का यह कथन सिद्ध करता है कि उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपने स्वामी की इच्छा को पूर्ण करना है। उनके लिए राम-काज से बढ़कर कुछ भी नहीं है। ३. पूर्ण शरणागति "दास" शब्द यह स्पष्ट करता है कि हनुमान जी ने अपना तन, मन और जीवन पूर्णतः श्री राम के चरणों में अर्पित कर दिया है। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ भक्त स्वयं के अस्तित्व को भूलकर केवल अपने आराध्य के अस्तित्व में लीन हो जाता है। ४. सेवा ही परम धर्म हनुमान जी के लिए भक्ति का अर्थ केवल नाम जपना नहीं, बल्कि निरंतर सेवा में रत रहना है। लंका दहन से लेकर संजीवनी लाने तक, उन्होंने हर कार्य एक सेवक की निष्ठा के साथ किया, कभी भी स्वयं को कर्ता (कार्य करने वाला) नहीं माना। ५. निस्वार्थ प्रेम एक सच्चा दास बदले में किसी फल की इच्छा नहीं रखता। हनुमान जी की भक्ति निष्काम है; उन्हें न मोक्ष चाहिए, न स्वर्ग, केवल श्री राम के चरणों की समीपता चाहिए।