#जनसेवक_रत्न_संतरामपालजी गरीब, बिना भगति क्या होत है, भावैं कासी करौंत लेह। मिटे नहीं मन बासना, बहुबिधि भर्म संदेह।।
पहले काशी में गंगा किनारे करौंत लगा रखा था। (करौंत: यह लकड़ी चीरने वाला एक बड़ा आरा होता है, जिसे दोनों तरफ लगे हैंडल से पकड़कर दो व्यक्तियों द्वारा चलाया जाता है।)
और भ्रम फैला रखा था, कि जो काशी में करौंत से गर्दन कटवा लेगा। वह स्वर्ग जाएगा। वृद्ध आदमी सोच लेता है कि मरना तो है ही। कल को बीमार होकर दुर्गति से मरूंगा। तो पैसे देकर, उन्होंने जान भी दी। लेकिन मोक्ष तो भक्ति से होगा इन बकवादों से थोड़े ही होता है।