रति देवी सनातन परंपरा में प्रेम, आकर्षण और दाम्पत्य माधुर्य की अधिष्ठात्री मानी गई हैं। वे कामभावना की अशुद्ध उत्तेजना नहीं, अपितु हृदय की कोमलता, सौंदर्य की अनुभूति और स्त्री-पुरुष के मध्य दिव्य सामंजस्य की शक्ति हैं। उनका स्वरूप मन को मोहित करने वाला, ललित और सुगंधित वसंत जैसा वर्णित है।
रति किसका रूप हैं
पुराणों में रति को सृष्टि के आनंद तत्व की अभिव्यक्ति माना गया है। वे कामदेव की अर्धांगिनी हैं और प्रेम की सूक्ष्म ऊर्जा का साकार रूप हैं। कुछ ग्रंथों में उन्हें लक्ष्मी की अंशशक्ति भी कहा गया है, क्योंकि जहाँ सौंदर्य, आकर्षण और समृद्धि का संयोग होता है, वहाँ रति तत्त्व विद्यमान रहता है।
उनका कार्य क्या है
रति का कार्य केवल इंद्रिय सुख तक सीमित नहीं है। वे दाम्पत्य जीवन में अनुराग, आकर्षण और स्थिर प्रेम को पुष्ट करती हैं। सृष्टि चक्र को गतिमान रखने में कामदेव के साथ उनका महत्वपूर्ण योगदान है। जब भगवान शिव के क्रोध से कामदेव भस्म हुए, तब रति के तप और करुण प्रार्थना से ही उन्हें पुनः अनंग रूप में प्रतिष्ठा मिली। यह कथा बताती है कि प्रेम का तत्त्व कभी नष्ट नहीं होता, वह रूप बदल सकता है, परंतु समाप्त नहीं होता।
क्या कलियुग में भी रति हैं
कलियुग में भी रति तत्त्व विद्यमान है। जहाँ सच्चा प्रेम है, जहाँ दाम्पत्य में सम्मान है, जहाँ आकर्षण मर्यादा से संयुक्त है, वहाँ रति की उपस्थिति मानी जाती है। किंतु जब प्रेम वासना में बदल जाता है और संबंध स्वार्थ से ग्रस्त हो जाते हैं, तब रति तत्त्व क्षीण हो जाता है। अतः रति की साधना बाहरी अनुष्ठान से अधिक अंतःकरण की पवित्रता से जुड़ी है।
रत्यै नमो माधुर्यरूपिण्यै नमो नमः।🙏💗🌺📸
कामेश्वरप्रियायै च सौभाग्यप्रदायिन्यै नमः॥🙏🚩
जो साधक दाम्पत्य में प्रेम, आकर्षण और मधुरता की कामना रखते हैं, वे मन की शुद्धि, परस्पर सम्मान और सौम्यता को अपनाएँ। यही रति की सच्ची आराधना है।
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