नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् ।
उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा ॥
[ महाभारत, शान्ति पर्व - १५/५० ]
☝🏻 यह प्रसिद्ध श्लोक गुण एवं दोष के महत्व को दर्शाता है । आइए इसे विस्तार से समझते हैं—
नात्यन्तं गुणवत् किञ्चित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम्
- नात्यन्तं गुणवत्— कोई भी वस्तु अत्यधिक गुणवान नहीं होती
- किञ्चित् — कोई भी वस्तु
- न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् — तथा न ही अत्यधिक दोषपूर्ण होती है
उभयं सर्वकार्येषु दृश्यते साध्वसाधु वा
- उभयं— दोनों ( गुण एवं दोष )
- सर्वकार्येषु— सभी कार्यों में
- दृश्यते— देखे जाते हैं
- साध्वसाधु वा— अच्छे अथवा बुरे रूप में
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अर्थात् 👉🏻 कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसमें सर्वथा गुण ही गुण हों । ऐसी भी वस्तु नहीं है जो सर्वथा गुणों से वंचित ही हो । सभी कार्यों में अच्छाई तथा बुराई दोनों ही देखने में आती है ।
🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄
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