#✍️ विचार #✍️सुविचार #☺चांगले विचार #☺️उच्च विचार
✿•┅━꧁🌹सुप्रभात 🌹꧂━┅•✿
✿ रविवार दि. ०८ फेब्रुवारी २०२६✿
✿ माघ शु. सप्तमी २०८२✿
✿शिवशक ३५२✿
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ஜ۩۞۩ संस्कृत सुभाषितमाला ۩۞۩ஜ
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श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा।
असम्भित्रायेमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥
भावार्थ : जो व्यक्ति गंथों-शास्त्रों से विद्या ग्रहण कर उसी के अनुरूप अपनी बुद्धि को ढलता है और अपनी बुद्धि का प्रयोग उसी प्राप्त विद्या के अनुरूप ही करता है तथा जो सज्जन पुरुषों की मर्यादा का कभी उल्लंघन नहीं करता, वही ज्ञानी है ।
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