#जय श्री कृष्ण
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भगवान कृष्ण द्वारा वसुदेव को आध्यात्मिक शिक्षा और देवकी के पुत्रों की वापसी
एक समय की बात है। माता देवकी ने यह सुना कि उनके पुत्र भगवान श्रीकृष्ण ने अपने गुरु संदीपनि मुनि के मृत पुत्र को यमलोक से वापस ला दिया था। यह सुनकर माता के हृदय में वर्षों से दबी एक पीड़ा जाग उठी।
कंस द्वारा मारे गए अपने छह पुत्रों की स्मृति ने देवकी को व्याकुल कर दिया। उन्होंने करुण स्वर में श्रीकृष्ण और बलराम से कहा—
“यदि संभव हो, तो मैं अपने उन पुत्रों को एक बार देखना चाहती हूँ, जिन्हें कंस ने जन्म लेते ही मार डाला था।”
भगवान की करुणा और लीला
माता की इस इच्छा को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने बिना किसी विलंब के उसे पूर्ण करने का निश्चय किया। वे पाताल लोक पहुँचे, जहाँ वे छहों पुत्र अपने पूर्व कर्मों और श्रापवश बंधे हुए थे।
भगवान ने अपनी दिव्य शक्ति से उन आत्माओं को मुक्त किया और उन्हें पुनः शिशु रूप में लेकर आए।
अद्भुत मिलन
जब वे शिशु देवकी और वसुदेव को सौंपे गए, तो वह क्षण अत्यंत भावुक और दिव्य था।
देवकी ने अपने उन पुत्रों को अपने दूध से पालन किया, जिनका सुख उन्हें कभी प्राप्त नहीं हुआ था। वर्षों की पीड़ा उस एक क्षण में आँसुओं में बह गई।
मोक्ष और उद्धार
वास्तव में वे छहों पुत्र मरीचि ऋषि के पुत्र थे, जो पूर्व जन्म में श्रापवश राक्षस योनि में जन्मे थे। भगवान के स्पर्श और दर्शन से उनका श्राप समाप्त हुआ और वे मोक्ष को प्राप्त कर अपने दिव्य लोक लौट गए।
आध्यात्मिक शिक्षा
इस लीला के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने वसुदेव को यह शिक्षा दी कि—
आत्मा अमर है
जन्म और मृत्यु केवल शरीर की अवस्थाएँ हैं
भगवान की कृपा से कर्मबंधन कट जाते हैं
🌺 यह अध्याय भगवान श्रीकृष्ण की असीम करुणा, माता-पिता के प्रति उनके प्रेम और जीवों के उद्धार की दिव्य लीला का अनुपम उदाहरण है।