#❤️जीवन की सीख :
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9. अभिमान
1. अभिमान अपने गुणों का अत्यधिक बोध है।
2. यह सूक्ष्म अहंकार का रूप है।
3. परमपिता परमात्मा के अनुसार यह भक्ति में बाधा है।
4. अभिमानी व्यक्ति दूसरों को छोटा समझता है।
5. इससे प्रेम घटता है।
6. आत्मज्ञान दूर हो जाता है।
7. अभिमान टूटने पर दुख होता है।
8. विनम्रता से ही इसका अंत संभव है।
10. मान
1. मान सम्मान की इच्छा है।
2. यह सामाजिक स्वीकृति पर निर्भर है।
3. परमपिता परमात्मा इसे अस्थायी बताते हैं।
4. मान मिलने पर अहं बढ़ता है।
5. न मिलने पर क्रोध आता है।
6. यह मन को चंचल बनाता है।
7. सच्चा संत मान-अमान से परे रहता है।
8. समभाव ही श्रेष्ठ अवस्था है।
11. प्रतिष्ठा का मोह
1. प्रतिष्ठा का मोह बाहरी छवि से जुड़ा है।
2. व्यक्ति समाज में ऊँचा दिखना चाहता है।
3. परमपिता परमात्मा इसे माया का जाल कहते हैं।
4. यह आत्मिक सादगी को नष्ट करता है।
5. व्यक्ति दिखावे में फँस जाता है।
6. सत्य छिप जाता है।
7. प्रतिष्ठा क्षणभंगुर है।
8. सच्ची प्रतिष्ठा चरित्र से आती है।
12. यश की लालसा
1. यश की लालसा प्रशंसा पाने की चाह है।
2. यह मन में सूक्ष्म लोभ है।
3. परमपिता परमात्मा सच्चे कर्म को निःस्वार्थ बताते हैं।
4. यश के पीछे दौड़ने से शांति नहीं मिलती।
5. व्यक्ति दूसरों पर निर्भर हो जाता है।
6. आलोचना से दुखी होता है।
7. यश अस्थायी है।
8. कर्म ही सच्ची पहचान है।
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13. कीर्ति का मोह
1. कीर्ति नाम फैलाने की इच्छा है।
2. यह प्रसिद्धि का आकर्षण है।
3. परमपिता परमात्मा आंतरिक शुद्धता को प्रधान मानते हैं।
4. कीर्ति का मोह भक्ति से दूर करता है।
5. व्यक्ति बाहरी प्रशंसा में उलझता है।
6. आत्ममंथन छूट जाता है।
7. कीर्ति समय के साथ मिटती है।
8. सच्ची कीर्ति सद्कर्म से मिलती है।
14. इज्जत का अहंकार
1. इज्जत का अहंकार सामाजिक पहचान पर गर्व है।
2. यह स्वयं को श्रेष्ठ समझने की प्रवृत्ति है।
3. परमपिता परमात्मा इसे माया का भ्रम कहते हैं।
4. इससे मन कठोर हो जाता है।
5. अपमान होने पर क्रोध बढ़ता है।
6. व्यक्ति क्षमा नहीं कर पाता।
7. इज्जत अस्थायी है।
8. नम्रता से ही सच्चा सम्मान मिलता है।
15. कपट
1. कपट मन की असत्य प्रवृत्ति है।
2. यह बाहर कुछ और, भीतर कुछ और होता है।
3. परमपिता परमात्मा पाखंड का विरोध करते हैं।
4. कपट भक्ति को निष्फल करता है।
5. इससे विश्वास टूटता है।
6. समाज में अविश्वास फैलता है।
7. कपटी व्यक्ति अशांत रहता है।
8. सरलता ही इसका समाधान है।
16. छल
1. छल जानबूझकर भ्रम देना है।
2. यह स्वार्थ से प्रेरित होता है।
3. परमपिता परमात्मा इसे अधर्म मानते हैं।
4. छल संबंधों को तोड़ता है।
5. इससे मन कलुषित होता है।
6. छल का फल दुख होता है।
7. सच्चाई से ही विश्वास बनता है।
8. निष्कपटता ही श्रेष्ठ मार्ग है।
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17. धोखा
1. धोखा विश्वास का टूटना है।
2. यह छल का परिणाम है।
3. परमपिता परमात्मा सत्य को सर्वोच्च मानते हैं।
4. धोखा आत्मा को कलुषित करता है।
5. इससे पीड़ा जन्म लेती है।
6. समाज में अविश्वास बढ़ता है।
7. धोखेबाज अंततः पछताता है।
8. ईमानदारी ही इसका उपचार है।
18. मक्कारी
1. मक्कारी चतुराई का दुरुपयोग है।
2. यह दूसरों को हानि पहुँचाने हेतु होती है।
3. परमपिता परमात्मा इसे अधर्म बताते हैं।
4. मक्कार व्यक्ति स्वार्थी होता है।
5. वह विश्वास खो देता है।
6. अंततः अकेला रह जाता है।
7. यह आत्मिक पतन का कारण है।
8. सादगी ही श्रेष्ठ गुण है।
19. धूर्तता
1. धूर्तता चालाकी का नकारात्मक रूप है।
2. इसमें कपट और छल दोनों शामिल हैं।
3. परमपिता परमात्मा सच्चाई को महत्व देते हैं।
4. धूर्त व्यक्ति लाभ के लिए संबंध बनाता है।
5. वह स्थायी सम्मान नहीं पाता।
6. धूर्तता से समाज दूषित होता है।
7. यह आत्मा को भारी बनाती है।
8. सरल हृदय ही श्रेष्ठ है।
20. पाखंड
1. पाखंड दिखावे की भक्ति है।
2. यह आंतरिक शुद्धता के बिना बाहरी आडंबर है।
3. परमपिता परमात्मा ने इसका तीव्र विरोध किया।
4. पाखंडी व्यक्ति दोहरा जीवन जीता है।
5. इससे आत्मिक प्रगति रुकती है।
6. समाज भ्रमित होता है।
7. पाखंड सत्य को ढक देता है।
8. सच्ची भक्ति मन से होती है।
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