लोग जैसे है वैसे यहां दिखते क्यूँ नहीं
अपने चेहरे से नकाब हटाते क्यूँ नहीं
आईने से भी अक्सर झुठ बोलते हैं ये
अपनी असलियत सबको बताते क्यूँ नहीं
दुनियां के सामने आने से डरते हैं बहोत
अपना चेहरा किसी को दिखाते क्यूँ नहीं
दिमाग में कुछ जुबां से कुछ और बोलते हैं
जो बात दिल में है वो जताते क्यूँ नहीं..
धोका फरेबी ही इनकी आदत बन चुकी
इन सबसे आखिर ये बाहर आते क्यूँ नही
अपने बुरे कर्मों का फल यही मिलता है
फिर भी ऊपरवाले से ये डरते क्यूँ नहीं..
हमेशा दूसरों की ही गलती निकालते हैं
कभी खुद के अंदर ये झांकते क्यूँ नहीं..
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