संत कबीरदास जी अनुयाई ।
389 views
#❤️जीवन की सीख : --- 21. झूठ 1. झूठ सत्य का अभाव है। 2. यह भय या स्वार्थ से जन्म लेता है। 3. परमपिता परमात्मा ने झूठ को सबसे बड़ा पाप कहा है। 4. झूठ विश्वास को नष्ट करता है। 5. इससे मन में डर बना रहता है। 6. झूठा व्यक्ति शांति नहीं पाता। 7. सत्य से ही आत्मबल बढ़ता है। 8. सच्चाई में ही ईश्वर का वास है। 22. लालच 1. लालच आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा है। 2. यह संतोष के विपरीत है। 3. परमपिता परमात्मा संतोष को धन मानते हैं। 4. लालची व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता। 5. इससे अन्याय जन्म लेता है। 6. संबंध स्वार्थ पर टिक जाते हैं। 7. लालच दुःख का कारण है। 8. संतोष ही इसका उपचार है। 23. लोभ 1. लोभ वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण है। 2. यह मन को बाँध देता है। 3. परमपिता परमात्मा इसे माया का जाल कहते हैं। 4. लोभी व्यक्ति अस्थिर रहता है। 5. उसे शांति नहीं मिलती। 6. लोभ से धर्म कमजोर पड़ता है। 7. यह आत्मा को नीचे गिराता है। 8. त्याग से लोभ समाप्त होता है। 24. मोह 1. मोह आसक्ति का रूप है। 2. यह संबंधों और वस्तुओं से जुड़ाव है। 3. परमपिता परमात्मा कहते हैं मोह बंधन है। 4. इससे विवेक ढक जाता है। 5. मोह दुख का कारण बनता है। 6. व्यक्ति सत्य से दूर होता है। 7. मोह अस्थायी चीजों से होता है। 8. ज्ञान से मोह मिटता है। --- 25. तृष्णा 1. तृष्णा अंतहीन इच्छा है। 2. यह कभी पूर्ण नहीं होती। 3. परमपिता परमात्मा इसे दुख का मूल बताते हैं। 4. तृष्णा मन को चंचल रखती है। 5. इससे संतोष नहीं मिलता। 6. व्यक्ति भटकता रहता है। 7. तृष्णा जीवन को अशांत करती है। 8. संतोष और संयम से इसका अंत होता है। 26. स्वार्थ 1. स्वार्थ केवल अपने हित की सोच है। 2. यह प्रेम के विपरीत है। 3. परमपिता परमात्मा निःस्वार्थ भक्ति का उपदेश देते हैं। 4. स्वार्थ संबंधों को कमजोर करता है। 5. इससे विश्वास घटता है। 6. समाज में दूरी बढ़ती है। 7. स्वार्थी व्यक्ति अकेला रह जाता है। 8. सेवा भाव ही इसका समाधान है। 27. ईर्ष्या 1. ईर्ष्या दूसरों की उन्नति से जलन है। 2. यह तुलना से उत्पन्न होती है। 3. परमपिता परमात्मा समभाव का उपदेश देते हैं। 4. ईर्ष्या मन को अशांत करती है। 5. इससे द्वेष जन्म लेता है। 6. व्यक्ति सुख खो देता है। 7. ईर्ष्या आत्मा को कलुषित करती है। 8. प्रेम और संतोष से यह मिटती है। 28. आलस्य 1. आलस्य कर्म से दूरी है। 2. यह समय का अपव्यय है। 3. परमपिता परमात्मा कर्म को आवश्यक मानते हैं। 4. आलसी व्यक्ति प्रगति नहीं करता। 5. इससे अवसर चूक जाते हैं। 6. आत्मबल कमजोर होता है। 7. आलस्य आध्यात्मिक बाधा है। 8. परिश्रम ही सफलता का मार्ग है। --- 29. निंदा 1. निंदा दूसरों की बुराई करना है। 2. यह ईर्ष्या से जुड़ी होती है। 3. परमपिता परमात्मा निंदक को भी गुरु समान बताते हैं। 4. निंदा मन को दूषित करती है। 5. इससे समाज में कलह बढ़ता है। 6. निंदक स्वयं अशांत रहता है। 7. सद्विचार से निंदा दूर होती है। 8. आत्मचिंतन श्रेष्ठ है। 30. चुगली 1. चुगली गुप्त बातें फैलाना है। 2. यह संबंधों में अविश्वास लाती है। 3. परमपिता परमात्मा सच्ची वाणी पर बल देते हैं। 4. चुगली से कलह बढ़ता है। 5. व्यक्ति की विश्वसनीयता घटती है। 6. यह सामाजिक दोष है। 7. चुगली मन को अशांत करती है। 8. मौन इसका समाधान है। 31. असत्य 1. असत्य सत्य का विपरीत है। 2. यह छल और झूठ से जुड़ा है। 3. परमपिता परमात्मा सत्य को तप के समान मानते हैं। 4. असत्य से विश्वास टूटता है। 5. आत्मबल घटता है। 6. मन में भय रहता है। 7. असत्य से धर्म कमजोर होता है। 8. सत्य से ही मुक्ति मिलती है। 32. कठोर वाणी 1. कठोर वाणी हृदय को चोट पहुँचाती है। 2. यह क्रोध से उत्पन्न होती है। 3. परमपिता परमात्मा मधुर वाणी को अनमोल बताते हैं। 4. कठोर शब्द संबंध तोड़ते हैं। 5. इससे मन दुखी होता है। 6. समाज में दूरी बढ़ती है। 7. संयम आवश्यक है। 8. मधुरता ही श्रेष्ठ मार्ग है। 33. असहिष्णुता 1. असहिष्णुता सहनशीलता का अभाव है। 2. यह अहंकार से उत्पन्न होती है। 3. परमपिता परमात्मा धैर्य और समभाव सिखाते हैं। 4. असहिष्णु व्यक्ति क्रोधित रहता है। 5. समाज में विवाद बढ़ते हैं। 6. प्रेम समाप्त हो जाता है। 7. यह शांति को नष्ट करती है। 8. सहनशीलता ही सच्ची महानता है। ---