ब्रज की महिमा और वहां की रज (धूल) के प्रति आपकी श्रद्धा वास्तव में हृदय को स्पर्श करने वाली है। वैष्णव परंपरा और ब्रज साहित्य में यह मान्यता बहुत गहरी है कि ब्रज की मिट्टी सामान्य धूल नहीं, बल्कि साक्षात श्री कृष्ण के चरणों का स्पर्श पाकर धन्य हुई है।
इस भाव को पुष्ट करते हुए कुछ सुंदर बिंदु यहाँ दिए गए हैं:
* भक्तों का विश्वास: माना जाता है कि ब्रज की रज में स्वयं श्री राधा-कृष्ण और अनगिनत संतों की चरण-धूलि समाहित है। इसीलिए भक्त यहाँ 'दंडवत' प्रणाम करते हैं और रज को मस्तक पर लगाते हैं।
* मुक्ति का मार्ग: जैसा कि आपने कहा, यह विश्वास है कि जो इस पावन मिट्टी में मिल जाता है (अर्थात जिसका अंतिम समय यहाँ बीतता है या जो यहाँ पूर्णतः शरणागत है), उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाती है और वह 'गोलोक धाम' को प्राप्त होता है।
* संतों की वाणी: रसखान जैसे कवियों ने तो यहाँ तक कहा कि यदि उन्हें अगला जन्म मिले, तो वे पत्थर भी गोवर्धन का ही बनना चाहेंगे ताकि इसी रज में बने रहें।
> "ब्रज की रज अति ही अनूप, जाको खोजत शिव चतुरानन।
> शेष महेश गणेश दिनेश, निरंतर ध्यान धरें मन मानन॥"
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ब्रज की रज का कण-कण प्रेम और भक्ति का प्रतीक है।
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