📜 जब पत्नी के एक ताने ने संसार को दिया 'तुलसीदास' 📜
प्रभु श्रीराम की भक्ति के शिखर पुरुष, गोस्वामी तुलसीदास जी, कोई जन्मजात देवदूत नहीं थे। वे भी हम और आप जैसे ही रक्त-मांस के मनुष्य थे—भावनाओं में बहने वाले और मोह में उलझे हुए।
उनका बचपन का नाम 'रामबोला' था। माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया था, इसलिए जीवन में असुरक्षा और अकेलेपन का भाव गहरा था। ऐसे में जब विवाह हुआ, तो पत्नी केवल जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि उनका पूरा संसार बन गईं।
यह कोई विकृति नहीं थी, बल्कि एक ऐसे मनुष्य का स्वभाव था जिसे जीवन में सहारा देर से मिला हो। रामबोला का प्रेम धीरे-धीरे गहरी आसक्ति में बदल गया। इतना गहरा मोह कि पत्नी के बिना एक पल भी बिताना असंभव लगने लगा।
⛈️ वह अंधेरी रात और मोह का चरम ⛈️
एक बार पत्नी को आवश्यक कार्य से मायके जाना पड़ा। रामबोला का मन नहीं माना। दिन तो जैसे-तैसे कट गया, पर रात होते ही मोह का अंधकार गहरा गया। आधी रात को, जब दुनिया सो रही थी, रामबोला का व्याकुल मन उन्हें ससुराल की ओर खींच ले गया।
न कोई योजना, न विवेक। अंधेरी रात, उफनती नदी, और सन्नाटा—पर इन सबसे बड़ा अंधकार उनके भीतर के मोह का था।
ससुराल पहुँचकर जब द्वार बंद मिला, तो दीवार पर लटकती एक रस्सी के सहारे वे ऊपर चढ़ गए। मोह में अंधे व्यक्ति को खतरा कहाँ दिखता है? जिसे वे रस्सी समझ रहे थे, वह वास्तव में एक साँप था।
⚡ वह क्षण जब सत्य 'वज्र' बन गया ⚡
जब वे पत्नी के कक्ष में पहुँचे, तो पत्नी चौंक उठीं। यह प्रेम नहीं, अंधापन था। उस क्षण पत्नी ने न डाँटा, न चीखीं... बस एक कड़वा सत्य कह दिया। और वही सत्य रामबोला के जीवन के लिए वज्र बन गया:
👉 "हाड़ मांस की देह मम, तापै ऐसी प्रीत।
ऐसी प्रीत जो राममय, होत न तौ भवभीत॥"
(अर्थात: मेरे इस हाड़-मांस के नश्वर शरीर से तुम इतना प्रेम करते हो। यदि इतना ही प्रेम श्रीराम से किया होता, तो तुम इस संसार-सागर से पार हो जाते।)
यह साधारण वाक्य नहीं था। यह वह क्षण था, जब ईश्वर ने पत्नी के मुख से उपदेश दिया था।
🙏 रामबोला का अंत, तुलसीदास का जन्म 🙏
रामबोला मौन हो गए। भीतर कुछ टूट गया। वर्षों की नींद एक ही झटके में खुल गई।
उसी क्षण निर्णय लिया—न घर लौटे, न कुछ बोले। बस 'राम-राम' जपते हुए निकल पड़े।
यहीं 'रामबोला' समाप्त हो गया और 'तुलसीदास' का जन्म हुआ।
बाद में जब पत्नी को अपनी कठोरता का आभास हुआ और उन्होंने पत्र लिखा, तो तुलसीदास जी ने जो उत्तर दिया, वह बताता है कि उन्होंने अब संसार का नहीं, राम-रस चख लिया था:
"एक कटे श्रीराम संग, बाँधि जटा सिर केस।
मैंने चाखा प्रेम रस, पतनी के उपदेश॥"
✨ चिंतन ✨
यह कथा पत्नी को कठोर बताने के लिए नहीं है। यह कथा यह बताती है कि कभी-कभी ईश्वर हमें जगाने के लिए हमारे सबसे निकटतम व्यक्ति को ही माध्यम बनाते हैं।
हम यह कथा रोज सुनते हैं, पर क्या कभी स्वीकार करते हैं? जिस दिन स्वीकार कर लिया, उसी दिन कोई न कोई दो पंक्तियाँ हमारे भीतर के 'रामबोला' को भी जगा देंगी।
यदि यह प्रसंग आपके हृदय को छू गया हो, तो इसे केवल कथा न समझें—इसे आईना समझें।
🌞🚩🚩 ।। जय श्री राम ।। 🚩🚩🌞
🌞🚩🚩 ।। जय बजरंग बली ।। 🚩🚩🌞
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