वृंदावन और रास
बालपन का था एक स्वप्निल ऐहसास।
आओ मुक्त होते है अब राधे
देखो पुकार रहा है पुरुषार्थ !!
माखन-मिसरी ,मोर पंख और बांसुरी ...
संभाले रखना मेरे लिये तुम सब !
गूंजेगा पांचजन्य का स्वर
देखो , मेरी उंगली पर आ टिका है अब सुदर्शन चक्र !!
रक्त में भीगा होगा मेरा नाम
इतिहास भी करे चाहे बदनाम
याद दिलाना पर तुम सबको
"बरसाने " में बिखरा मेरा अनुराग !!
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