प्यारी प्रीतम चरण-रज, दुर्लभ देहु मिलाय।
धन्य धन्य वे रसिक जन, मन तन कुंजन आय ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर
श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि ऐसी कृपा हो जाए कि अत्यन्त दुर्लभ श्रीहित लाड़िली-लाल के श्रीचरणों की रज में मैं भी रज बन कर मिल जाऊँ ।
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