*श्रीकृष्ण_३२* *शिशुपाल_वध*
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जब भगवान् श्रीकृष्ण भीमसेनद्वारा जरासन्धका वध करवाकर तथा उसके द्वारा बन्दी बनाये गये राजाओंको मुक्त करके इन्द्रप्रस्थ लौट आये तब महाराज युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञका आयोजन किया। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णाकी अनुमतिसे वेदवादी ब्राह्मणोंका आचार्य आदिके रूपमें वरण किया। धर्मराज युधिष्ठिरने सभी प्रधान ऋषियोंके साथ द्रोणाचार्य, भीष्मपितामह, कृपाचार्य, धृतराष्ट्र, दुर्योधन तथा विदुर आदिको भी यज्ञमें आमन्त्रित किया। राजसूय यज्ञका दर्शन करनेके लिये देश-विदेशके सब राजा, उनके मन्त्री तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-सब-के-सब वहाँ आये।
ब्राह्मणोंने सोनेके हलोंसे यज्ञभूमिको जुतवाकर राजा युधिष्ठिरको शास्त्रानुसार यज्ञकी दीक्षा दी। यज्ञके सब पात्र सोनेके बने हुए थे। विधिपूर्वक यज्ञकार्य प्रारम्भ हुआ। अब सभासद लोग इस विषयपर विचार करने लगे कि सदस्योंमें अग्रपूजा किसकी होनी चाहिये। जितनी मति थी उतने मत। इसलिये सर्वसम्मतिसे कोई निर्णय न हो सका।
सहदेवने कहा— 'यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण ही अग्रपूजाके अधिकारी हैं। यह सारा विश्व ही श्रीकृष्णका रूप है। समस्त यज्ञ भी श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं। ये अपने संकल्पसे ही जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। इसलिये सबसे महान् भगवान् श्रीकृष्णकी ही अग्रपूजा होनी चाहिये।' इतना कहकर सहदेव चुप हो गये। उस समय युधिष्ठिरकी यज्ञसभामें जितने सत्पुरुष थे, सबने एक स्वरसे 'बहुत ठीक' कहकर सहदेवकी बातका समर्थन किया।
धर्मराज युधिष्ठिरने सभासदोंका अभिप्राय जानकर बड़े ही आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके पाँव पखारे। उस समय देवताओंने आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा की।
अपने आसनपर बैठा शिशुपाल यह सब देख रहा था। भगवान् श्रीकृष्णकी अग्रपूजा देखकर वह मन-ही-मन जल-भुन गया। उसने कहा— 'सभासदो! आपलोग अग्रपूजाके अधिकारी पात्रका चयन करनेमें सर्वथा असमर्थ रहे। बालक सहदेवके कहनेपर आपलोग कृष्णकी अग्रपूजा कर रहे हैं, जो कदापि उचित नहीं है। यहाँपर बड़े-बड़े तपस्वी, ज्ञानी, ब्रह्मनिष्ठ महात्मा बैठे हुए हैं, जिनकी पूजा लोकपाल भी करते हैं। उनको छोड़कर यह कुलकलङ्क ग्वाला भला अग्रपूजाका अधिकारी कैसे हो सकता है। यह लोकमर्यादाका उल्लङ्घन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई भी गुण नहीं है। फिर यह अग्रपूजाका पात्र कैसे हो सकता है।' इस प्रकार शिशुपालने भगवान् श्रीकृष्णको और भी बहुत-सी खरी-खोटी सुनायी।
सभासदोंके लिये शिशुपालकी बात सुनना असह्य हो गया। उसे मार डालनेके लिये पाण्डव, मत्स्य, केकय और सूर्यवंशी राजा हाथमें हथियार लेकर खड़े हो गये। परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें शान्त करते हुए कहा कि मैंने अपनी बुआको इसकी सौ गालियाँ क्षमा करनेका वचन दे रखा है। जैसे ही वे पूरी हो जायँगी, इसका अन्त निश्चित है। जब शिशुपाल सौसे अधिक गालियाँ बकने लगा, तब भगवान्ने सबके देखते-देखते अपने सुदर्शन चक्रसे उसका सिर काट डाला। उसके शरीरसे एक दिव्य ज्योति निकलकर श्रीकृष्णमें समा गयी। वह वैरभावसे ही सही, भगवान्का चिन्तन करनेके कारण मुक्त हो गया।
जय श्री कृष्ण
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