sn vyas
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6 days ago
#धर्म ध्यान से सुनिए पढ़िए धर्म का प्रयोजन धन संग्रह नहीं है। 🚩👆👇 धर्म का एक ही लक्ष्य है। अन्तःकरण की शुद्धि, और वही शुद्ध अन्तःकरण मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाता है। धन धर्म का साधन हो सकता है, पर धन भोग का हेतु नहीं है। भोग का प्रयोजन इन्द्रियों को तृप्त करना नहीं, अपितु जीवन-निर्वाह मात्र है। और जीवन का प्रयोजन भी अधिकाधिक कर्म करना नहीं है; जीवन का वास्तविक प्रयोजन है -- तत्त्व-जिज्ञासा। जब मनुष्य इस क्रम को समझ लेता है, तभी उसके भीतर यह प्रश्न जागृत होता है कि तत्त्व क्या है। तत्त्ववेत्ता जन कहते हैं.. जिसे हम तत्त्व कहते हैं, वह कोई दृश्य वस्तु नहीं, कोई कर्मजन्य उपलब्धि नहीं, वह है अद्वय ज्ञान। अद्वय का अर्थ है। जहाँ द्वैत का सर्वथा अभाव हो। ज्ञाता के रूप में जो जीव और ईश्वर दिखाई देते हैं, और ज्ञेय के रूप में जो व्यष्टि और समष्टि, कार्य और कारण, व्यक्त और अव्यक्त रूप से फैला हुआ यह समस्त प्रपंच है। इन दोनों से जो सर्वथा रहित है, और फिर भी इन सबके भाव और अभाव का अधिष्ठान है; जो स्वयं प्रकाश है, चेतन है, और ज्ञानस्वरूप है। वही अद्वय तत्त्व है। और उसी अद्वय तत्त्व को शास्त्र ब्रह्म कहते हैं, वही परमात्मा कहलाता है, और वही भगवान के नाम से जाना जाता है। 🚩जय जय हनुमान 🚩