होली का अर्थ
रंगों की उन्मुक्तता नहीं,
संयम की गरिमा है।
जहाँ स्पर्श
इजाज़त से जन्म ले,
और हँसी
सम्मान की छाँव में खिले।
जहाँ अबीर उड़े
तो किसी की असहजता न उड़ाए,
जहाँ पिचकारी चले
तो किसी की मर्यादा न भिगोए।
रंगों का उत्सव
भीतर की धूल धोने का नाम है,
न कि किसी की सीमा लाँघने का अधिकार।
होली वह है
जहाँ “बुरा न मानो”
किसी की चुप्पी का सहारा न बने,
और मस्ती
किसी की मजबूरी पर भारी न पड़े।
जहाँ हर रंग
पहले पूछा जाए,
फिर लगाया जाए —
जैसे रिश्ते
पहले समझे जाते हैं,
फिर निभाए जाते हैं।
होली वह है
जो देह से पहले
मन को छुए,
और चेहरे से पहले
विश्वास को रंग दे।
अगर उत्सव में
सम्मान बचा रहे —
तो ही सच में
रंग पवित्र हैं!!!
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