तुम आदत नहीं इबादत हो .....
कैसे कह दूँ कि तुम एक छलावा हो ......!
कैसे मनाऊँ जज़्बातों को कि तुम किस तरह की इबादत हो .....
कभी कहते हो , साथ रहना है .....
और कभी खुद से ही दूर भागना है .....
मांगा बहुत कुछ है तुमसे
पर तुमने कभी दिया नहीं .....
कभी वक़्त ,
कभी ज़ज्बात
कभी हार
कभी जीत .....
बस नहीं माँगा तो ये भौतिक दुनिया के
मन को लुभाने वाला उपहार .....
जिसे तुम हर बार देने को तैयार थे ......
मुझे मलाल नहीं कि ,
मैं उस पर मलाल करुं ......
बस सवाल करना है
कि उन तोहफ़े से कब तक लोगों को लुभाया जाएगा ......?
कितना भयंकर नीरस जीवन हो जाएगा
जब इस सभ्यता का अंत हो जाएगा .....?
कैसे लोग समझेंगे
लोगों के दिलों की बातें ......?
कैसे बयां करेंगे अपनी जज्बातें
क्या सिर्फ शब्द ही काफी होंगे
किसीको अपना सर्वस्व न्योछावर करने में ......
खैर छोड़िए .....
सवालात भी क्या ही करना
जब मुझे ज़वाब पता हो ......
मुझे पता है मेरी इबादत
और तुम्हारी आदत .......
"सिर्फ एक आदत थी "
.............❤
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