ब्रज में एक गोपी रहती थी, जिसका नाम था 'सुखिया'। वह बेचारी बहुत गरीब थी, लेकिन उसका मन केवल कान्हा के चरणों में लगा रहता था। वह रोज जंगल से घास काटती, गायों की सेवा करती और कंडे (उपले) बनाकर उन्हें बेचती, जिससे उसका जीवन चलता था।
एक दिन सुखिया गोपी नंद बाबा के आंगन के पास से गुजर रही थी। उसके सिर पर कंडों की टोकरी थी। तभी नन्हे बाल-कृष्ण (ठाकुर जी) दौड़ते हुए आए और गोपी का रास्ता रोक लिया।
काले-कजरारे नैनों वाले लला ने बड़ी मासूमियत से कहा— "अरी गोपी! तू यहाँ से रोज गोबर ले जाती है और मेरे बाबा की गायों के गोबर के कंडे बनाकर बेचती है। क्या तूने कभी इसका दाम चुकाया है?"
गोपी तो लला की यह बात सुनकर निहाल हो गई। वह मुस्कुराते हुए बोली— "अरे लाला! तू तो बड़ा हिसाब रखता है। बता, तेरे गोबर की कीमत क्या है? मैं क्या दूँ तुझे?"
नटखट कान्हा ने अपनी कमर पर हाथ रखकर बड़े ठाठ से कहा— "देख गोपी! मुझे धन-दौलत नहीं चाहिए। तू जो ये कंडे बेचकर पैसे कमाती है, उनसे जो माखन खरीदेगी, वह मुझे चाहिए। आज से मेरे गोबर का दाम केवल 'माखन' है!"
गोपी की आंखों में आंसू आ गए। उसने सोचा कि यह त्रिभुवन का स्वामी, जिसके पास कुबेर का खजाना है, आज मुझसे दो उंगली माखन मांग रहा है। वह बोली— "ठीक है कान्हा! पर तुझे माखन ऐसे नहीं मिलेगा। तुझे मेरे साथ नाचना होगा और मेरा गाना गाना होगा।"
फिर क्या था! भगवान, जो बड़े-बड़े योगियों के ध्यान में भी नहीं आते, उस गोपी के प्रेम के वशीभूत होकर उसके चारों ओर "ता-ता थैया" करने लगे। गोपी ने लला को खूब नचाया और अंत में अपनी टोकरी से वह सारा ताज़ा माखन निकाल कर कान्हा के मुख में डाल दिया।
जैसे ही कान्हा ने माखन खाया, गोपी की खाली टोकरी देखते ही देखते सोने की मुहरों और रत्नों से भर गई। लेकिन सुखिया गोपी ने उन रत्नों की ओर देखा तक नहीं, क्योंकि उसे तो वह मिल गया था जिसे पाने के लिए ब्रह्मा और शिव भी तरसते हैं— ठाकुर जी का साक्षात प्रेम
Sunita Bairagi 💕
#🌸 जय श्री कृष्ण😇 #🙏🦚जय श्री कृष्णा🙏🦚 #🌺राधा कृष्ण💞 #🤗जया किशोरी जी🕉️ #syama pyari owner Sunita Bairragi