यादों का चाँद लिये मेरे आंगन में
तुम सांझ की धूप सा
धीरे धीरे यूँ मुझमें ढल जाते हो
कहो कितना चाहूं तुमको मैं
कि हो जाओ तुम भी मेरे
ये मुझे तुम न बतलाते हो
कोई ख्वाहिश जो आँखों में
उतर आती है तुम्हारी, तो
मेरी नजरों से तुम गैरों सा छुपाते हो
सांझ की धूप सा तुम
धीरे धीरे मुझमें ढल जाते हो,
सारी राहें मेरी अब तो
तेरी ओर ही खींची चली जाती हैं
और मेरी राहों से तुम
धीरे धीरे ओझल हुए चले जाते हो
लकीरों में हो या नहीं मेरी तुम
ये ढूंढती हूँ मैं हर रोज सितारों में
और तुम हो कि पूर्णिमा का चाँद बन इठलाते हो,
कहो कितना चाहूं तुमको मैं
कि हो जाओ तुम भी मेरे
ये मुझे तुम न बतलाते हो।❤️
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