गुजरात में अगर आप किसी दुकान पर जाकर “मूंगफली” माँगें, तो दुकानदार हल्की‑सी मुस्कान के साथ बोलेगा — सिंग दाणा। यहाँ मूंगफली को मूंगफली नहीं कहा जाता, और यह सिर्फ भाषा का फर्क नहीं है, बल्कि इसके पीछे मिट्टी, मौसम, स्वाद और आदतों की पूरी कहानी छुपी है।
नाम में ही छुपा है अर्थ
गुजराती भाषा में मूंगफली को सिंग दाणा कहा जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि मूंगफली ज़मीन के नीचे फली में पैदा होती है, इसलिए गुजराती शब्द सीधे उसकी प्रकृति से जुड़ा है — सिंग यानी फली और दाणा यानी दाना। यानी फली के भीतर दाना। यह नाम जितना सरल है, उतना ही ज़मीनी भी।
स्वाद की असली वजह
गुजरात की मूंगफली इसलिए मशहूर नहीं है कि उसका दाना बहुत बड़ा होता है, बल्कि इसलिए कि उसका स्वाद गहरा और खुशबूदार होता है। सौराष्ट्र, जूनागढ़, अमरेली और राजकोट जैसे इलाकों की हल्की मिट्टी, तेज धूप और कम नमी मूंगफली के दाने में तेल और प्राकृतिक सुगंध भर देती है।
यही वजह है कि यहाँ की मूंगफली आकार में छोटी होने के बावजूद भूनने पर ज्यादा खुशबू देती है और कच्ची भी हल्की‑सी मीठी लगती है। दूसरी जगहों से आई मूंगफली को यहाँ अक्सर “पानी वाली” कह दिया जाता है, क्योंकि उसमें वह गहरापन नहीं होता।
सिर्फ फसल नहीं, आदत है
गुजरात में सिंग दाणा सिर्फ एक फसल नहीं है, यह जीवनशैली का हिस्सा है। यहाँ शायद ही कोई ऐसा मौका होगा जहाँ सिंग दाणा मौजूद न हो।
यह उपवास में भी है, रोज़मर्रा के खाने में भी। स्ट्रीट फूड से लेकर घर की थाली तक, हर जगह इसकी मौजूदगी दिखती है। दाबेली, फाफड़ा, चाट — सब में सिंग दाणा अपनी पहचान बनाए रखता है। यहाँ तक कि शराब के साथ चखने में भी सिंग दाणा ज़रूरी माना जाता है।
तेल से जुड़ा भरोसा
आज भी गुजरात के बहुत से घरों में रोज़मर्रा के खाने में मूंगफली का तेल ही इस्तेमाल होता है। हल्का, खुशबूदार और भरोसेमंद। शायद यही वजह है कि गुजराती खाना आम तौर पर बहुत ज़्यादा मसालेदार नहीं होता। सिंग दाणा का तेल खाने को उसका असली स्वाद देता है, बिना भारीपन के।
उत्पादन और परंपरा
कहा जाता है कि गुजरात देश के उन राज्यों में शामिल है जहाँ सबसे ज़्यादा मूंगफली का उत्पादन होता है। लेकिन इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि गुजराती समाज ने सिंग दाणा को अपने संस्कार और संस्कृति का हिस्सा बना लिया है।
मिट्टी में पैदा होकर खेतों से गुजरते हुए, बाजारों और रसोई तक पहुँचने वाली यह मूंगफली, गुजरात में सिर्फ खाने की चीज़ नहीं रहती — यह पहचान बन जाती है।
मिट्टी से पेट तक की कहानी
सिंग दाणा की यह कहानी दरअसल गुजरात की मिट्टी से गुजराती लोगों के पेट तक की यात्रा है। छोटी‑सी मूंगफली में छुपा बड़ा स्वाद, मेहनत, मौसम और परंपरा — यही है गुजरात का सिंग दाणा।
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