#हर हर महादेव
भगवान शिव (महादेव) के उपदेशों और धर्मग्रंथों के अनुसार, मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके स्वयं के भीतर स्थित 'अहंकार' (Ego) है। महादेव के अनुसार अहंकार ही वह मूल कारण है जिससे अन्य सभी विकार उत्पन्न होते हैं।
महादेव के अनुसार मनुष्य के मुख्य आंतरिक शत्रु इस प्रकार हैं:
अहंकार (अहंकार ही मूल शत्रु)
महादेव सिखाते हैं कि 'मैं' की भावना ही मनुष्य के पतन का कारण बनती है। जब व्यक्ति स्वयं को कर्ता मान लेता है और अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने लगता है, तो वह सत्य के मार्ग से भटक जाता है। अहंकार ही मनुष्य को ईश्वर और उसकी अपनी आत्मा से दूर कर देता है।
अज्ञान (माया)
सत्य को न जान पाना और इस नश्वर संसार को ही सत्य मान लेना सबसे बड़ा अज्ञान है। महादेव के अनुसार, अज्ञानता वह अंधकार है जो मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटका देता है। जब तक मनुष्य अज्ञान रूपी शत्रु को नहीं हराता, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।
क्रोध (विनाश का द्वार)
क्रोध मनुष्य की विवेक शक्ति को नष्ट कर देता है। शिव जी का तीसरा नेत्र इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने भीतर के क्रोध और नकारात्मकता को ज्ञान की अग्नि से भस्म कर देना चाहिए। क्रोध में किया गया कोई भी कार्य अंततः दुःख का कारण बनता है।
मोह और आसक्ति
सांसारिक वस्तुओं और नश्वर रिश्तों के प्रति अत्यधिक लगाव (मोह) मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाता है। महादेव, जो स्वयं वैरागी हैं, यह संदेश देते हैं कि संसार में रहते हुए भी अनासक्त रहना ही श्रेष्ठ है। मोह ही मनुष्य को बंधनों में जकड़ कर रखता है।
काम (वासना)
अनियंत्रित इच्छाएं और वासनाएं मनुष्य के मन को कभी शांत नहीं होने देतीं। महादेव ने कामदेव को भस्म कर यह सिखाया था कि यदि मनुष्य अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखता, तो वह अपने ही विनाश का कारण बनता है।