Inder Saini5
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8 hours ago
#🙏ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਗੁਰਪੁਰਬ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਹਰਿਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਜੀ💐 . *┈┉┅━❀।।ੴ।।❀━┅┉┈* *सतिनामु श्री वाहिगुरू* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *_꧁♡ गुरू घर की साखियां ♡꧂_* 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 *धंन श्री गुरु हरिक्रिशन देव जी* 🔆 🔆🔆 🔆🔆 🔆🔆 *चैत्र सुदी चौदस ( 1 अप्रैल )* *ज्योती ज्योत (गुरुपुरब) को समर्पित* ---------------------------------- *(भाग 5)* *ज्योती जोत* श्री गुरु हरिकृष्ण जी ने अनेकों रोगियों को रोग से मुक्त किया। आप बहुत ही कोमल व उद्वार हृदय के स्वामी थे। आप किसी को भी दुखी देख नहीं सकते थे और न ही किसी की आस्था अथवा श्रद्धा को टूटता हुआ देख सकते थे। असंख्य रोगी आपकी कृपा के पात्र बने और पूर्ण स्वास्थ्य लाभ उठाकर घरों को लौट गये। यह सब जब आपके भाई रामराय ने सुना तो वह कह उठा कि श्री गुरू हरिकृष्ण पूर्व गुरूजनों के सिद्धांतों के विरूद्व आचरण कर रहे हैं। पूर्व गुरूजन प्रकृति के कार्यों में हस्ताक्षेप नहीं करते थे और न ही सभी रोगियों को स्वास्थ्य लाभ देते थे। यदि वह किसी भक्तजन पर कृपा करते भी थे तो उन्हें अपने औषद्यालय की दवा देकर उसका उपचार करते थे। एक बार हमारे दादा श्री गुरदिता जी ने आत्म बल से मृत गाय को जीवित कर दिया था तो हमारे पितामा जी ने उन्हें बदले में शरीर त्यागने के लिए संकेत किया था। ठीक इसी प्रकार दादा जी के छोटे भाई श्री अटल जी ने सांप द्वारा काटने पर मृत मोहन को जीवित किया था तो पितामा श्री हरिगोविद जी ने उन्हें भी बदले में अपने प्राणों की आहुति देने को कहा था। ऐसी ही एक घटना कुछ दिन पहले हमारे पिता श्री हरिराय जी के समय में भी हुई है, उनके दरबार में एक मृत बालक का शव लाया गया था, जिस के अभिभावक (ब्रहामण) बहुत करूणामय रूदन कर रहे थे। कुछ लोग दयावश उस शव को जीवित करने का आग्रह कर रहे थे और बता रहे थे कि यदि यह बालक जीवित हो जाता है तो गुरू घर की महिमा खूब बढ़ेगी किन्तु पिता श्री ने केवल एक शर्त रखी थी कि जो गुरू घर की महिमा को बढ़ता हुआ देखना चाहता है तो वह व्यक्ति अपने प्राणों का बलिदान दे जिससे मृत बालक को बदले में जीवन दान दिया जा सके। उस समय भाई भगतू जी के छोटे सुपुत्र जीवन जी ने अपने प्राणों की आहुति दी थी और वह एकांत में शरीर त्याग गये थे, जिसके बदले में उस मृत ब्राह्मण पुत्र को जीवनदान दिया गया था। परन्तु अब श्री हरिकृष्ण बिना सोच विचार के आत्मबल का प्रयोग किये जा रहे हैं। जब यह बात श्री गुरू हरिकृष्ण जी के कानों तक पहुंची तो उन्होंने इस बात को बहुत गम्भीरता से लिया। उन्होंने स्वयं चित्त में भी सभी घटनाओं पर क्रमवार एक दृष्टि डाली और प्रकृति के सिद्धांतों का अनुसरण करने का मन बना लिया, जिसके अन्तर्गत आपने अपनी जीवन लीला रोगियों पर न्योछावर करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने का मन बना लिया। बस फिर क्या था? आप अकस्मात् चेचक रोग से ग्रस्त दिखाई देने लगे। जल्दी ही आपके पूरे बदन पर फुंसियां दिखाई देने लगी और तेज़ बुखार होने लगा। आप अधिकांश समय बेसुध् पड़े रहने लगे। जब आपको चेतन अवस्था हुई तो कुछ प्रमुख सिक्खों ने आपका स्वास्थ्य जानने की इच्छा से आपसे बातचीत की तब आपने संदेश दिया कि हम यह नश्वर शरीर त्यागने जा रहे हैं, तभी उन्होंने आपसे पूछा कि आपके पश्चात् सिक्ख संगत की अगुवाई कौन करेगा ? इस प्रश्न के उत्तर में अपने उत्तराध्किारी की नियुक्ति वाली परम्परा के अनुसार कुछ सामग्री मंगवाई और उस सामग्री को थाल में सजाकर सेवक गुरूदेव के पास ले आए। आपने अपने हाथ में थाल लेकर पाँच बार घुमाया मानों किसी व्यक्ति की आरती उतारी जा रही हो और कहा ‘बाबा बसहि बकाले। बनि गुरु संगति सकल समाले। इस प्रकार सांकेतिक संदेश देकर अपने अंतिम समय में गुरु जी ने अपनी शयनावस्था में ही गुरुवाणी के इन पंक्तियों का उच्चारण किया था– *जो तुधु भावै साई भलीकार।* *तू सदा सलामत निरंकार।* और आप ज्योतिजोत समा गये (निधन हो गया) । यह समाचार जँगल में आग की तरह समस्त दिल्ली नगर में फैल गया और लोग गुरूदेव जी के पार्थिव शरीर के अन्तिम दर्शनों के लिए आने लगे। यह समाचार जब बादशाह औरंगजेब को मिला तो वह गुरूदेव जी के पार्थिव शरीर के दर्शनों के लिए आया। जब वो प्रवेश करने लगा तो उसका सिर बहुत बुरी तरह से चकराने लगा किन्तु वह बलपूर्वक शव के पास पहुँच ही गया, जैसे ही वह चादर उठा कर गुरूदेव जी के मुखमण्डल देखने को लपका तो उसे किसी अदृश्य शक्ति ने रोक लिया और विेकराल रूप धर कर भयभीत कर दिया। सम्राट उसी क्षण चीखता हुआ लौट गया। गुरु जी ने जीवन यात्रा के इस अंतिम समय में उपस्थित सभी संगत को दर्शन-दीदार देकर अपनी माता कृष्ण कौर जी की गोद में अपना शीश रखकर देह त्यागी थी। यमुना नदी के तट पर ही आप की चिता सजाई गई ‘श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब जी के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर वर्तमान समय में *गुरुद्वारा बंगला साहिब* सुशोभित है। 🙏 नोट:- गुरु जी द्वारा स्थापित किया हुआ चश्मा जिसके निर्मल जल (अंम्रित) से चेचक के रोगियों का इलाज हुआ था। उस चश्में के निर्मल जल को वर्तमान समय में उपस्थित दर्शनाभिलाषी संगत को छकाया (पिलाया) जाता है। (‘श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी’ को संगत प्रेम पूर्वक ‘बाला प्रीतम’ के नाम से भी संबोधित करती है)। आज की इतनी सेवा परवान कीजिये अगली हाजरी में (कल) पढ़ेंगे गुरू घर से जुड़ी एक और साखी ।🙏 *प्यार से कहिये:-* *धंन श्री गुरू नानक देव जी* *धंन श्री गुरू हरि क्रिशन देव जी* *🙏भूल चुक की क्षमा🙏* 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 #🙏ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ #🙏ਅੱਜ ਦਾ ਹੁਕਮਨਾਮਾ #🙏 ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ