लक्ष्मीनारायण नागला
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सात सुर: संगीत के 7 प्राणी भारतीय शास्त्रीय संगीत में सात मूल स्वर होते हैं — सा, रे, ग, म, प, ध, नी। इन्हें सप्तक भी कहा जाता है। इन सात स्वरों से ही संपूर्ण संगीत की रचना होती है। प्राचीन ग्रंथों में इन स्वरों की उत्पत्ति को प्रकृति और प्राणियों की ध्वनियों से जोड़ा गया है। 1. षड्ज (सा – मोर) सा स्वर को षड्ज कहा जाता है। मान्यता है कि इसकी ध्वनि मोर की आवाज़ से प्रेरित है। यह संगीत का आधार स्वर है और बाकी सभी स्वर इसी से उत्पन्न माने जाते हैं। 2. ऋषभ (रे – बैल) रे स्वर को ऋषभ कहते हैं। इसकी तुलना बैल की गूँजती हुई आवाज़ से की जाती है। यह स्वर स्थिरता और गहराई प्रदान करता है। 3. गांधार (ग – बकरा) गांधार स्वर को बकरे की ध्वनि से जोड़ा जाता है। यह स्वर मधुरता और भाव को प्रकट करता है। 4. मध्यम (म – बगुला) मध्यम स्वर को बगुले की शांत ध्वनि से संबंधित माना जाता है। यह स्वर संतुलन और शांति का प्रतीक है। 5. पंचम (प – कोयल) पंचम स्वर को कोयल की मधुर कूक से जोड़ा जाता है। यह स्वर संगीत में मधुरता और आकर्षण लाता है। 6. धैवत (ध – घोड़ा) धैवत स्वर को घोड़े की ऊर्जावान ध्वनि से प्रेरित माना जाता है। यह शक्ति और गति का प्रतीक है। 7. निषाद (नी – हाथी) निषाद स्वर को हाथी की गंभीर और गूंजती ध्वनि से जोड़ा जाता है। यह स्वर पूर्णता का संकेत देता है। ये सातों स्वर मिलकर भारतीय संगीत की आत्मा बनाते हैं। शास्त्रीय गायन, वादन और रागों की रचना इन्हीं स्वरों पर आधारित है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सप्तक से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं, इसलिए इनका ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है। #सा रे गा मा पा की विजेता को बधाई #सरगम सा रे गा मा #सा रे गा मा पा