sn vyas
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1 months ago
#शिव ज्ञान [[[सत्यम जयते]]] श्री गुरूवे नमः #शैव_दर्शन शैवमत एक प्रमुख शैवधर्म है जो भगवान शिव को सर्वोच्च ईश्वर मानता है। इस धर्म के अनुयायी शैव कहलाते हैं और इसकी परंपराएं वेदों और उपनिषदों में पाई जाती हैं। शैवमत के कई संप्रदाय हैं, जिनमें पाशुपत, शैवसिद्धांत, कश्मीर शैव मत, नाथ, और वीर शैव मत प्रमुख हैं। इस प्रकार शिव के पांच मुख्य से प्रवाहित हुई शैवशास्त्र रूप सरिताएँ मुलत: बयानवे धाराओं में बह निकली ये ही अभेदरूप भैरव शास्त्र भेदाभेद रूप रूद्रशास्त्र भेदरूप शिवशास्त्र के रूप में प्रकट हुई इन शास्त्रों को तीन श्रेणियों में इस प्रकार बांटा जा सकता है।१.अभेद या अद्वैत:-जगद्रूप अनेकता में एकता के अनुभव का प्रत्यभिज्ञान इन शास्त्रों को भैरव शास्त्र कहते हैं।२.भेदाभेद:- एकता और अनेकता की यह दोनों दृष्टिकोणों के अनुसार सिद्धांतों का कथन इन में होता है ये रूद्र शास्त्र कहलाते हैं।३.भेद:- अनेकता में ही इस सिद्धांत के सार का अवलोकन होने से यह भेदशास्त्र कहा जाता है यह शिवशास्त्र कहलाते हैं।तंत्र साहित्य अधिकांश संवाद शैली में ही विकसित हुआ है कहीं शिव गुरु होते हैं पार्वती शिष्या होती है तो कहीं पार्वती गुरु के रूप में उपदेश करती है शिव शिष्य के रूप में होते हैं aइसी शैली भेद में धाराएं बन गई है शैव और शाक्त। यद्यपि दोनों ही धाराओं का मूल लक्ष्य आतम ज्ञान तथा कल्याण प्राप्ति है फिर भी एक में आत्म संयम पर व इंद्रिय निग्रह पर बल दिया गया है दूसरी इस विषय पर उदार रही है योग का दोनों ही धाराओं में विशेष स्थान रहा है शैव मत के अधिष्ठातृ देव शिव भी योगिराज कहे जाते हैं। शैव दर्शन के पांच सम्प्रदाय ही मुख्य है १.महापाशुपत संप्रदाय,२. सिद्धान्त शैव सम्प्रदाय,३ वीरशैव सिद्धान्त, ४.शाक्त मत,५. काश्मीर शैव मत।इनमें से प्रथम तीन महापाशुपत शैव सिद्धांत एवं वीर शैवमत का विकास दक्षिण के तीन राज्यों आंध्र प्रदेश तमिल नाडु तथा कर्नाटक में हुआ है इसके विपरीत शाक्तमत की विभिन्न शाखाएं भारत के विभिन्न भागों में समय-समय पर विकसित होती रही काश्मीर शैवमत का प्रादुर्भाव कश्मीर में हुआ।.पाशुपत सम्प्रदाय :- इसे नकुलीश पाशुपत भी कहा जाता है सर्वदर्शन संग्रह में माधवाचार्य ने इस संप्रदाय का उल्लेख वैराग्य साधना के रूप में किया पशुपत संप्रदाय पंचार्थ संप्रदाय कहलाता है क्योंकि इसमें पांच विषयों की मुख्य रूप से चर्चा की गई है यह पांच विषय प्रकार है कार्य, कारण,योग, विधि, एवं दुःखान्त। पाशुपत संप्रदाय के दार्शनिकों के अनुसार पाशुपत विधि के द्वारा जगत के कारण भगवान पशुपति अर्थात शिव की प्राप्ति होती है एवं सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है । प्रभु द्वारा निर्दिष्ट वैरीग्याचारों का पालन करके साधक भगवान पशुपति के अनुग्रह का अधिकारी हो जाता है पशु अर्थात जो पाशों में बंधा हुआ जीव है पाश का अर्थ है कार्य कारण इसे ही कला कहा गया है। पशुपति मार्ग का तीसरा विषय योग हैs जिसकी एक निश्चित प्रक्रिया है यह विधि है अंतिम तत्त्व दुःखान्त है जिस अवस्था में जीव मोक्ष प्राप्त करने के पश्चात उन्हें वापस नहीं आता वह दुखांत अवस्था है पशुपति संप्रदाय में यम तथा नियमों का विशेष महत्व दिया गया है इसमें साधना द्वारा मोक्ष प्राप्त करना ही मुख्य बिंदु है।शिव को इस संप्रदाय में पशुपति कहा गया है hइसलिए इस संप्रदाय का नाम पाशुपत संप्रदाय है पशु अर्थात जीव एवं पति अर्थात् स्वामी शिव ही संपूर्ण चराचर जगत का स्वामी है अतः वह पशुपति है इस संप्रदाय के ग्रंथ का सूत्र सूत्र एवं उन पर कौण्डिण्य भाष्य है ।सिद्धान्त शैव अथवा दक्षिण शैवमत का विकास विशेष रूप से तमिलनाडु में हुआ है सिद्धांत शैवमत का प्रथम उन्मेषकाल ईशा की ग्यारहवीं शताब्दी का समय हैo इस पंथ के प्रमुख स्त्रोत मृगेन्द्र तन्त्र आदि आगम है इसी सिद्धांत मे जीवात्मा को पशु कहा गया है तथा इसे अणु क्षेत्रज्ञ आदि नामों से भी अभिहित किया गया है सिद्धांत से मत में पशु की तीन कोटियाँ निर्धारित की गई है विज्ञानकल, प्रलयाकल तथा सकल। वीरशैव मदिराज तथा मदारम्ब के पुत्र वसव को शैव मत का प्रवर्तक माना गया है शैव योगी गोरखनाथ क सिद्ध सिद्धांत पद्धति इसी संप्रदाय का ग्रंथ है इसी संप्रदाय को वीर संप्रदाय कहा गया है क्योंकि ये हठयोग साधना द्वारा इंद्रियों को जीतने को महत्व देते हैं। यह भी कहा जाता है किसी शिवनिंदा सुन कर वीर शैव मता अनुयायियों का क्रोध सीमा से बाहर हो जाता है संभवत इसी कारण से इनका नाम वीर पड़ा है kइस सिद्धांत का सार यह है कि योग परम तादात्म्य का उत्प्रेरक है। प्राण शक्ति वायु को पूर्णरूपेण रोककर प्रबल प्रयत्न से चित् स्थिर किए बिना भक्ति नहीं हो सकती एवं बंधन से मुक्ति नहीं हो सकती यह षडस्थल सिद्धांत इसकी चिंतन पद्धति का प्राण है।