sn vyas
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9 hours ago
#जय सियाराम #🙏🙏जय सियाराम 🙏🙏 ।।जय श्री राम।। नवमहुं एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।। भगवान ने शबरी माता से कहा कि माता यह नौ प्रकार की भक्ति है । शबरी माता ने पूंछा प्रभु इन नौ में कितने प्रकार की भक्ति हों तो कल्याण हो जाता है?। श्री राम जी ने कहा नौ में पांच सात तीन दो नहीं, नौ में से यदि एक भी भक्ति किसी के पास है तो उसका कल्याण है। शबरी माता ने पूंछा प्रभु यह भक्ति करने का अधिकार किसको है? ज्ञान के तो सब अधिकारी नहीं होते हैं?वैराग्यवान ही ज्ञान का अधिकारी होता है। धर्म की व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं यज्ञ के भी सब अधिकारी नहीं होते हैं इसलिए मुझे यह समझाने की कृपा करें कि भक्ति करने का अधिकारी कौन है?। श्री राम जी ने कहा सबरी माता भक्ति ऐसी है कि इसमें अधिकार वाली कोई बात ही नहीं है। चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो कोई भी हों भक्ति के सब अधिकारी हैं शर्त केवल यह है कि कपट त्याग दें। शबरी जी ने कहा भगवान मुझमें तो कोई भक्ति होगी नहीं क्योंकि मैं तो अधम से भी अधम हूं मतिमंद हूं। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं देखो भक्त की दीनता देखो। भगवान तो सबरी जी की कुटिया को आश्रम समझ रहे हैं। (ताहि देइ गति राम उदारा। ) (सबरी के आश्रम पगु धारा ) और सबरी जी अपनी कुटिया को घर समझ रहीहैं(सबरी देखि राम गृह आए ) जब शबरी मैया ने श्री राम जी से पूंछा कि प्रभु मुझ में तो कोई भक्ति होगी नहीं तब श्री राम जी ने कहा मैय्या तुझ में तो सब तरह की भक्ति है। तुम्हारे पास नौ प्रकार की भक्ति है। प्रथम भक्ति संतन करि संगा, तो तुम यहां वन में संतों का संग पाने के उद्देश्य से वन में आई तो तुम्हारे पास यह पहली भक्ति है।दूसरि रति मम कथा प्रसंगा, तो तुमने महात्माओं के बीच में कथा सुनी तो यह तुम्हारी दूसरी भक्ति है। मतंग ऋषि का गुरु भाव से आश्रय लिया तो यह तुम्हारी तीसरी भक्ति है।और अब तक मेरा गुणगान करके मेरी प्रतीक्षा की है तो गुरु आज्ञा का पालन किया राम-राम करते हुए मेरी प्रतीक्षा की तो मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा सज्जन धर्मा का पालन किया। तुमने अमान होकर मेरा भजन किया किसी ने तुम्हारा अपमान भी किया तो तुमने कोई शिकायत नहीं रखी सपने में भी उनमें कोई दोष नहीं देखा।और आज भी तुम सरल होकर कह रही हो कि मैं अधम हूं। इसलिए शबरी माता तुम्हारे में सभी भक्तियां हैं। श्री राम जी ने सबरी माता से कहा माता इस नवधा भक्ति उपदेश देकर एक तरह से मैंने तुम्हारी स्तुति ही की है अब मुझे आज्ञा दीजिए। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि यदि आप श्री जानकी जी की कोई खबर जानती हों तो बताने की कृपा करें। सबरी माता ने कहा प्रभु आप पंपा नामक सरोवर पर जाइए वहां आपकी मित्रता सुग्रीव से होगी वह आपको श्री सीता जी का सब हाल बतायेगा। अब भगवान सबरी माता से विदा लेने लगे। भगवान ने कहा शबरी माता अब मैं जाऊं ?शबरी माता ने कहा प्रभु अभी नहीं। मेरी इन आंखों ने आपको आते हुए देखा है अब अपने से दूर जाते हुए नहीं देख सकती। शबरी माता कहती है प्रभु आप जब तक ठहरे रहो जब तक मैं नहीं जाती हूं। श्री राम जी ठहर गए। शबरी माता ने भगवान के चरणों में दृष्टि लगाई। गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज लिखते हैं। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जंह नहि फिरे।। शबरी माता भगवान के उस धाम को गई जहां से आना नहीं होता है।अब श्री राम जी भाई श्री लक्ष्मण जी के साथ वन में श्री सीता जी को खोजते हुए आगे की ओर चलते हैं । श्री राम जी ने एक अत्यंत सुंदर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया वृक्ष की सुंदर छाया देखकर श्री राम जी उसके नीचे बैठ गए। श्री लक्ष्मण जी ने देखा कि श्री राम जी वृक्ष के नीचे बैठे हैं और बंदर वृक्ष के ऊपर बैठे हैं। लक्ष्मण जी ने श्री राम जी से कहा प्रभु इन बंदरों में शिष्टाचार वाली कोई बात ही नहीं है। आप वृक्ष के नीचे बैठे हैं और यह वृक्ष के ऊपर बैठे हैं आप कहो तो मैं इन्हें कुछ सबक सिखाऊ?। श्री राम जी ने मुस्कुराते हुए कहा नहीं लक्ष्मण इन्हें बैठे रहने दो। कहीं नारद जी आ गये तो कम से कम यह तो उन्हें लगेगा कि राम जी स्वतंत्र नहीं है वह बंदर वाला श्राप अभी भी इनके सिर पर है इसलिए बंदरों को मेरे सिर पर ही बैठे रहने दो। श्री राम जी और लक्ष्मण जी के बीच यह वार्तालाप चल ही रहा था कि तबतक नारद जी वहां आ ही पहुंचे। नारद जी ने भगवान को विरह युक्त अवस्था में देखा। नारद जी समझ गए कि आज भगवान मेरे ही श्राप का परिणाम भोग रहे हैं। नारद जी श्री राम जी के पास जाते हैं और श्री राम जी और नारद जी के बीच क्या संवाद होता है यह प्रसंग अगली पोस्ट में ।।जय श्री राम।।