प्रेम और उलझन -ये दोनों शब्द एक साथ हो ही नहीं सकते।
उलझन वहाँ जन्म लेती है जहाँ मन में स्पष्टता नहीं होती,
जहाँ भाव अधूरे होते हैं
और जहाँ हृदय अभी स्वयं को ही समझ नहीं पाया होता।
मन/अंतरात्मा ही सबसे बड़ा न्यायालय है। यह बिना किसी गवाह के हमारे हर कर्म, अच्छे या बुरे, को जानता है और सही न्याय करता है। बाहरी दुनिया से झूठ बोला जा सकता है, लेकिन इंसान अपने मन से कभी झूठ नहीं बोल सकता, क्योंकि अंतरात्मा की आवाज हमेशा सच जानती है।
सब से बड़ा न्यायालय तो हमारा मन होता हैं, वो सब जनता हैं हम ने किस का अच्छा किया, किस का बुरा।
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