sn vyas
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7 hours ago
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *ईश्वर की बनाई सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है जो न विद्यमान हो | यहाँ सुख है तो दुख भी है , गुण है तो अवगुण भी है , प्रकाश है तो अंधकार भी है | कहने का तात्पर्य यह है कि सब कुछ इस सृष्टि में है और प्रत्येक मनुष्य इसका अनुभव भी अपने जीवन में करता रहता है | यहाँ यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह क्या ग्रहण करता है | प्राचीनकाल से ही मनुष्य में स्वयं को स्थापित करने एवं दूसरों को तुच्छ समझने की मानसिकता रही है | दूसरों का दोष देखना मनुष्य की प्रवृत्ति रही है | मनुष्य को अवगुणों को ग्रहण करते समय यह अवश्य ध्यान देना चाहिए कि जब हम बाजार जाते हैं तो वहाँ अनेक प्रकार अच्छी एवं निष्प्रयोज्य (सूखी एवं सड़ी) सब्जियाँ या खाद्य सामग्रियाँ रहती हैं | परंतु हम वहाँ पर अच्छी सब्जियाँ ही खरीदते हैं न कि निष्प्रयोज्य | जब हम बाजार से अच्छी ही वस्तु खरीदना पसन्द करते हैं तो भला दोषों का ग्रहण कैसे कर लेते हैं | जहाँ मनुष्य परदोष दर्शन का आदी हो जाता है वहीं उसका जीवन कंटकमय होना प्रारम्भ हो जाता है | दूसरों के दोष देखने की आदत बहुत बुरी है | मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जब तक पति अपनी पत्नी के या पत्नी अपने पति के दोष ही देखते रहते हैं , तब तक गृहस्थ−जीवन कभी शान्तिमय नहीं रहता | दोष देखने की आदत पड़ जाने से सामने वाले व्यक्ति के दोष ही दोष दीखते हैं, उसमें अच्छे अच्छे गुण भी हों पर वे तिल का ताड़ बनाने की इस बुरी आदत के कारण वैसे ही नहीं दीखते जैसे कि तिनके की आड़ में पहाड़ छुप जाता है | दूसरों के दोष देखना, छिद्रान्वेषण करना महान मानस रोग है | इससे प्रत्येक व्यक्ति को मुक्त होना चाहिए |* *आज समाज प्रगतिशील हो गया है , पहले की अपेक्षा आज के मनुष्य स्वयं को सुशिक्षित एवं योग्य भी मानते हैं | मनुष्य ने विकास तो बहुत किया परंतु वह गुणग्राही होने के स्वभाव का त्याग करता प्रतीत हो रहा है | आज परदोष दर्शन की प्रवृत्ति लोगों में बढती जा रही है | आज का मनुष्य किसी भी सम्बन्धी के एक दोष के कारण उसके अनेक गुणों को अनदेखा कर देता है , जिससे उसका जीवनपथ दुरूह होने लगता है | मैंने "आचार्य अर्जुन तिवारी" ने जो अनुभव किया है उसके अनुसार दूसरों के दोष देखना भगवान के प्रति कृतघ्न होना है , क्योंकि सभी भगवान के बनाये हुए हैं | हम शिकायत करते रहते हैं कि हमारा अमुक सम्बन्धी ऐसा है, वैसा है | पर हम समस्या के दूसरे पहलू पर विचार नहीं करते | हम अपने उस सम्बन्धी के उन विशेष गुणों का ध्यान ही नहीं करते जो अन्य लोगों में नहीं हैं और जिनके कारण हम उन उलझनों से बचे रहते हैं जिनसे कि दूसरे परेशान हैं | हम बहुधा यह भूल जाते हैं कि हमें जो सम्बन्धी मिला है वह दूसरों के सम्बन्धियों की अपेक्षा अनेक बातों में बहुत अच्छा है ओर व्यर्थ में ही हम अपने उस सम्बन्धी के कारण अपने भाग्य को कोसते हैं | इस तरह हम विधाता के प्रति कृतघ्न बनते हैं | इसके अतिरिक्त हम इसलिए भी कृतघ्न हैं कि हम अपने सम्बन्धी की की हुई सेवाओं की सराहना नहीं करते | सिर्फ दूसरों के दोष देखने में ही हमारा जीवन व्यतीत होने लगता है | आज यही हो रहा है मनुष्य अपने दोषों को छुपाने के लिए दूसरों को दोषी सिद्ध करने में अपनी सारी ऊर्जा व्यय कर रहा है , जो कि मनुष्य के लिए घातक है |* *पर−दोष−दर्शन के दोष से मुक्ति पाने के लिए हमें पर−गुण−चिन्तन की आदत डालनी चाहिए प्रतिपक्षी के गुणों का विचार करना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को ाज दिवस की *"मंगलमय कामना*🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #❤️जीवन की सीख #☝आज का ज्ञान #☝अनमोल ज्ञान