यह मेरी बेस्ट सिनेमेटोग्राफर अवॉर्डेड फिल्म:- "SAWA SER GEHUN" ( Hindi ) जो मुंशी प्रेमचंद जी की उपन्यास "सवा सेर गेहूँ" पर आधारित है। यह वर्किंग स्टील क्रेन के साथ कलाकारों और मेरे लिए बेहद रिस्की है।
“मोबाइल पर 2 मिनट का वीडियो बनाना और बात है, लेकिन फिल्म बनाना युद्ध लड़ने जैसा काम है।
धूप, रात, रिस्क, पैसा, मेहनत और सैकड़ों लोगों की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। एक सिनेमेटोग्राफर अपनी ज़िन्दगी के साथ-साथ कलाकारों की जिन्दगी को भी दाव पर लगा कर फ़िल्मों का बेहतरीन से बेहतरीन शॉट लेते हैं।
इसलिए थिएटर जाए बिना किसी फिल्म को ‘फालतू’ बेकार' बोल देना, उन सभी मेहनतकश लोगों का अपमान है जो पर्दे के पीछे जान लगा देते हैं।”
2-3 घंटे की फिल्म बनाने में कई लोगों की महीनों की मेहनत, नींद, पैसा और जिंदगी लगती है।
एक्टर सिर्फ चेहरा होता है, लेकिन उसके पीछे लेखक, निर्देशक, नृत्य निर्देशक, फाइट मास्टर डीओपी के साथ कैमरा टीम, एडिटर, कलरिस्ट, साउंड रिकॉर्डिस्ट, लाइटमैन, स्पॉट बॉय — सैकड़ों लोगों का पसीना होता है।
इसलिए सिनेमाघर जाए बिना और पूरी मेहनत समझे बिना किसी फिल्म को एक नजर में ‘फालतू’ बोल देना आसान है, लेकिन फिल्म बनाना आसान नहीं, बेहद मुश्किल काम है।
आलोचना जरूर करें, मगर हम जैसे मेहनत करने वालों की इज्जत के साथ।”
Dop Shiva Chaudhary
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