यह फैसला शिक्षा के अकादमिक उद्देश्य से ज़्यादा वैचारिक एजेंडा प्रतीत होता है। जब पाठ्यक्रम में स्वतंत्रता संग्राम, क्रांतिकारियों, किसान आंदोलनों, संविधान निर्माताओं और बलिदानी वीरों के इतिहास की जगह व्यक्तिपूजा या संगठन-केन्द्रित सामग्री बढ़ती है, तो शिक्षा संतुलित नहीं रह जाती।
विडंबना यह है कि चुनावों में शहीदों और राष्ट्रवाद के नाम पर समर्थन माँगा जाता है, लेकिन किसी भी क्रांतिकारी को आज तक आधिकारिक “शहीद” का सम्मान नहीं मिला। इससे संदेश जाता है कि बलिदान का सम्मान कम, राजनीतिक उपयोग ज़्यादा हो रहा है।
देश को ऐसे पाठ्यक्रम की ज़रूरत है जो शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चन्द्र शेखर आज़ाद, उधम सिंह, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सैनिकों और जननायकों के योगदान को प्राथमिकता दे—न कि किसी एक दल या नेता की छवि निर्माण को।
(मास्टर राजेश लठवाल 'चिड़ाना'
अध्यक्ष - शहीद भगत सिंह ब्रिगेड गोहाना 9466435185)
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