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✿•┅━꧁🌹सुप्रभात 🌹꧂━┅•✿
✿ बुधवार दि. १३ मे २०२६✿
✿वैशाख कृ. एकादशी शके १९४८✿
✿ विक्रम सवत्सर २०८२✿
✿ शिवशक ३५२ ✿
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ஜ۩۞۩ संस्कृत सुभाषितमाला ۩۞۩ஜ
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यस्मात् त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इव।
सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते ॥
भावार्थ : जैसे शिकारी से हिरण भयभीत रहते हैं, उसी प्रकार जिस राजा से उसकी प्रजा भयभीत रहती है, फिर चाहे वह पूरी पृथ्वी का ही स्वामी क्यों न हो, प्रजा उसका परित्याग कर देती है।
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