सुचिता जामगावकर जैन
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18 days ago
🚩सनातन धर्म के चार युग: सत्य से कलियुग तक मानव चेतना, धर्म और समय का अद्भुत चक्र 🚩भारतीय सनातन परंपरा में समय को केवल घड़ी की सूइयों या वर्षों की गणना से नहीं देखा गया, बल्कि उसे चेतना, धर्म, संस्कार और मानव प्रवृत्तियों के क्रमिक उत्थान-पतन के रूप में समझा गया है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने समय को चार महान युगों—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—में विभाजित किया। यह केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, नैतिकता, आध्यात्मिकता और सामाजिक संरचना के गहरे मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक विश्लेषण का अद्भुत प्रतिरूप है। वेदों, पुराणों और महाभारत में वर्णित यह युगचक्र आज भी भारतीय मानस को दिशा देता है और यह समझने में सहायता करता है कि मानवता किन आदर्शों से दूर हुई और किन मूल्यों की ओर उसे पुनः लौटना चाहिए। 🚩सनातन धर्म में समय को रेखीय नहीं, बल्कि चक्रीय माना गया है। जिस प्रकार ऋतुएँ बार-बार लौटती हैं, उसी प्रकार युग भी निरंतर परिवर्तनशील चक्र में प्रवाहित होते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण के अनुसार धर्म को एक चार पैरों वाले वृषभ के रूप में चित्रित किया गया है। सतयुग में धर्म अपने चारों चरणों पर स्थिर रहता है, किंतु प्रत्येक अगले युग में उसका एक-एक चरण क्षीण होता जाता है। यही कारण है कि सतयुग पूर्ण सत्य और सात्त्विकता का प्रतीक माना गया, जबकि कलियुग में धर्म केवल एक चरण पर टिकता दिखाई देता है। 🚩सतयुग को कृतयुग भी कहा जाता है। यह मानव चेतना की सर्वोच्च अवस्था का युग माना गया है। इस युग में सत्य, तप, करुणा, संयम और आध्यात्मिकता मानव जीवन का स्वाभाविक अंग थे। मनुष्य का अंतःकरण निर्मल था, प्राणशक्ति अत्यंत प्रबल थी और जीवन पूर्णतः सात्त्विक प्रवृत्तियों से संच जैन युवा मंच महाराष्ट्र राज्य का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App https://primetrace.com/group/2874/post/1186641953?utm_source=android_post_share_web&referral_code=P6BRH&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=ADMIN #🌞 Good Morning🌞