✒️🏄♀️✒️🏄♀️✒️🏄♀️✒️🏄♀️✒️🏄♀️✒️🏄♀️🏄♀️✒️
दर्द कागज़ पर मेरा बिकता रहा,
मैं बेचैन था रात भर लिखता रहा
छू रहे थे सब बुलंदियाँ आसमान की,
मैं सितारों के बीच चाँद सा छिपता रहा
अकड़ होती तो कब का टूट गया होता,
मैं था नाज़ुक डाली जो सबके आगे झुकता रहा
बदले यहाँ लोगों ने रंग अपने अपने ढंग से,
रंग मेरा भी निखरा पर मेहंदी की तरह पिसता रहा
जिन्हें जल्दी थी वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,
मैं समंदर से राज़ गहराई का सीखता रहा
🏄♀️ सुप्रभात 🏄♀️ #🌞 Good Morning🌞